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इंशा जी दीवाने

इब्ने इंशा

यौवन··हिन्दी

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मै कविताएं पढ़ता हूँ, कविताएं लिखता हूँ। यही मेरे लिए सबसे मज़ेदार साहित्यिक विधा है। बीते कुछ बरसों में मैने कुछ नए पुराने कवियों, शाइरों को पढ़ा। इसी दौरान मेरा तआरुफ़ इब्न-ए-इंशा से हुआ। इंशा जी की पैदाइश हिंदुस्तान की थी, पर जब उनका निधन हुआ तब वो पाकिस्तान के थे। इंशा जी मेरे सबसे अज़ीज़ कवि हैं, इंशा जी की कविताएं बहुत सरल, जीवंत और ज़रूरी हैं। इंशा जी की चाँद के लिए मोहब्बत, शहरे तमन्ना की बातें, और उनके नाम के मानी। यही तीन बातें मुझे सबसे अव्वल इंशा जी के बारे में याद आती हैं।

शेर मोहम्मद खां क्यूँ इब्न-ए-इंशा हुए ये वही जानते हैं, पर हमारे लिए ये जानना अहम है की इंशा जी के नाम के मानी ‘साहित्य का बेटा’ है। मैने इंशा जी की लिखी किताब ‘उर्दू की आखिरी किताब’ करीब दो बरस पहले पढ़ी थी। वो किताब बुनियादी तौर पर इतनी पुरज़ोर है की उसकी अपनी अलग अहमियत है। इंशा जी की चाँद के लिए मोहब्बत अमूमन हर लेख और हर कविता में दिख जाती है, पर ‘चाँद नगर’ (जो की उनकी कविताओं का संकलन है) में उन्होंने सब समेट दिया। चाँद नगर के पहले कुछ पन्ने पढ़ने के बाद मैं चकित था, खुश था और इसका कारण शहरे तमन्ना के बारे में इंशा जी की बातें थी। हम सब ने सुना है ‘एल डोराडो’, द सिटी ऑफ गोल्ड के बारे में, इंशा जी ने इसे ही शहरे तमन्ना कहा है।

किसी भी लेखक के लेखन को समझने के लिए अमूमन हम उनकी ज़िंदगी के बारे में पढ़ते हैं, उनके हालातों के बारे में जानते हैं, वो किसके साथ उठे-बैठे, उन्होंने किस्से मोहब्बत की और कहाँ बसर किया। इंशा जी के बारे में ये सब जान कर हम बस उन जैसी हस्ती के मुरीद हो सकते हैं। इंशा जी महान प्रतिभाओं के धनी थे, उन्होंने जो भी लिखा, जो भी कहा, वो सब कालजयी है। मैंने बहुत बार कोशिश की है मैं उन जैसा लिख पाऊँ, पर इंशा जी की परछाई तक को छू पाना मुश्किल है।

इंशा जी की ये दो पंक्तियाँ जिनमे शहरे तमन्ना की एक झलक है।

“इंशा जी ये और नगर है, इस बस्ती की रीत यही 
सबकी अपनी अपनी आँखें, सबका अपना अपना चाँद”

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अंत में, एक कविता जिसके लिए आप यहाँ आए हैं।

बाम पे बैठे एक नज़ाराआधा चाँद, जहां से न्यारा चाँद ज़मीं से दूर कहीं है चाँद अजल से ऐसा ही है नील आसमां, रात अंधेरी पीत का चाँद, सर्द मुंडेरीचाँद की ख़ातिर, क्या है चारानन्ही गुड़िया, या एक तारा मेरा चाँद, हमारा चाँदतन्हा है, बेचारा चाँदचाँद की बिपदा, क्यों है ऐसी मन की चाहत, कब थी ऐसी चाँद तुम्हारे मन में क्या है तन्हापन का रोग नया है रोगी हो जाए जब बचपन पीत के रोग में पड़ जाए मन अभी तो तुमको चलना भी हैरूप बदलना, ढलना भी है दुनिया की इस शब की ख़ातिर रोज़ बदलती छब की ख़ातिर

-यौवन

इंशा जी दीवाने · Youvan Prakashan