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कश्मीर शैव दर्शन

सर्वेभ्यः सर्व सर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्र रूपेभ्यः

यौवन··हिन्दी

image The trident (triśūlābija maṇḍalam) symbol and yantra of Parama Shiva, representing the triadic energies of the supreme (wikipedia) शैव धर्म प्रगवैदिक है, ये मान्यता है की इसके जनक आर्य और द्रविड दोनों ही थे। प्रचलित मत ये है की आर्यों ने शिव को विलंब से स्वीकार किया, इसका उदाहरण दक्षप्रजापती की कथा में हमें मिलता है। इस कथा में हमें प्रत्यक्ष रूप में ये जानकारी मिलती है की शिव को दक्षप्रजापती के यज्ञ में कोई स्थान नहीं दिया गया था। प्रग्यावन मनीषी ये मानते हैं की जब आर्य और द्रविड़ों में विवाह संबंध स्थापित होने लगे, तब द्रविड शैव स्त्रियाँ शिव की भावना आर्य घरों तक लाईं। इन भावनाओं के प्रसार को अनेक उपायों से आर्य पुरोहितों ने रोकने का प्रयास किया। परंतु ग्रहों में नारियों की प्रधानता होने के कारण शैव भावना का दमन ना हो सका।

शैव धर्म की स्थापना दक्षिण से शुरू हुई, इस क्रम में सबसे अव्वल तमिल शैव हुए, फिर वीर शैव और आज सबसे प्रचलित शैव स्थापना कश्मीर शैव है। तमिल शैव में जात का भेद नहीं पाया जाता, तमिल शैव पुरोहित जाति रहित शैव आराधना में विश्वास रखते थे।

कश्मीर शैव दर्शन के पाँच नाम हैं, कश्मीर शैव पंचतत्वों से निर्मित है इसी कारण से उसके पाँच नाम भी हैं। कश्मीर शैव दर्शन, स्पंद दर्शन, त्रिक दर्शन, त्रियंबिकम दर्शन और प्रतिभिज्ञ दर्शन, कश्मीर शैव दर्शन के नाम हैं। प्रतिभिज्ञ दर्शन शैव दर्शन का सबसे विकसित रूप है। कश्मीर शैव दर्शन का मूल आधार शिव स्तोत्र है, शिव की आराधना से अनेकों पथों पर अग्रसर होना ही शैव दर्शन का लक्ष्य है। कश्मीर शैव कहते हैं की वसुगुप्त को प्रभु शिव ने स्वप्न में दर्शन दिए और शिव सूत्र कहे, वसु ने स्वप्न में कहे सभी सूत्रों को याद रखा और उन्हे सूत्रबद्ध किया। कश्मीर शैव, वसु के शिव सूत्रों को अपना आधार मानते हैं। कश्मीर शैव आगमों को प्रमाण मानते हैं, वेदों को नहीं।

शैव दर्शन के त्रिक में :-

  • शैव सिद्धांत

  • मालिनी तंत्र

  • तंत्रागम / वमागम

छठी सदी में वसु को शिव के दर्शन हुए, उनके लेखों, विचारों को मूलभूत रख कर अनेकों विद्वान और मनीषी हुए और संप्रदाय आगे बढ़ता गया। दसवीं सदी में कश्मीर शैव दर्शन के सबसे विद्वान संत हुए, उनका नाम था अभिनवगुप्त। अभिनवगुप्त अनेकों प्रतिभाओं के धनी थे।

अभिनवगुप्त ने अपनी विद्वत्ता का प्रमाण काव्यशास्त्र, दर्शन और तंत्र में दिया। अभिनवगुप्त ने मंत्रों की रचना की, दर्शन के क्षेत्र में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान प्रतिभिज्ञ दर्शनी हुआ, तंत्र के क्षेत्र में ‘तंत्रालोक’ अभिनवगुप्त का श्रेष्ठतम ग्रंथ माना जाता है। अभिनवगुप्त वाम तंत्र / वामक तंत्र और मालिनी तंत्र के भी अद्भुत ज्ञाता थे।

अभिनवगुप्त ने कश्मीर शैव को नए आयाम दिए। इस दर्शन को स्पंद दर्शन भी कहा गया है। शिव स्पंद शक्ति से बंधे हुए हैं, स्पंद का अर्थ है हिलना। शिव में क्रिया शक्ति है, शिव ब्रह्म से अलग हैं, ब्रह्म करता भोक्ता नहीं हैं परंतु शिव में स्पंद शक्ति है। स्पंद शक्ति ही क्रिया करवाने वाली शक्ति है। स्पंद शक्ति से जगत का निर्माण हुआ है, जगत निर्माण के बाद स्पंद शक्ति लय का कारण बन जाती है। स्पंद के वर्णन के बाद हम पहुंचते हैं कि ये दर्शन अद्वैत दर्शन है। शिव और शक्ति एक दूसरे से अलग हो ही नहीं सकते, यह अद्वैत है। ये मानते हैं की जीव भगवान शंकर से अलग नहीं है। जीव में यदि सारे अवगुण भी हैं, बाध्य भी है तब भी वह शिव से अलग नहीं है। आदिशांकर कहते हैं जीव माया ने उत्पन्न किया है, कश्मीर शैव वाले मानते हैं कि जीव का अस्तित्व सत्य है, सत है। ये जगत को मिथ्या नहीं कहते, ये मानते हैं की जगत भगवान से उत्पन्न है, ये शंकर की जगनमिथ्या को नहीं मानते परंतु ये अद्वैतवादी हैं। जीव और शिव में कोई भेद नहीं करते इसलिए अद्वैतवादी हैं।

अब प्रतिभिज्ञता पर आते हैं, प्रतिभिज्ञता का अर्थ है पहचानना। जीसे हम कुछ अंतराल के लिए भूल गए हैं उसे पहचानना। अज्ञान की जो परतें जीव पर हैं जिनके कारण जीव भूल गया है वो क्या है, कि वो ही शिव है। अपने स्वरूप को अपने सामने प्रकट करना और उसे पहचानना ही प्रतिभिज्ञ दर्शन का मूल और उद्देश्य है। अज्ञान को हटाने की अनेकों विधियाँ हैं। जीव अपने आप को बस ज्ञान के प्रकाश से ही पहचान सकता है। इसी क्रिया के दौरान, इसी क्रिया के माध्यम से जीव जान पाता है की वह माया की रचना नहीं है, वह माया से अलग है।

· अहम ब्रह्मास्मि – वेदान्त

· शिवोहम – शैव दर्शन

शेर और गीदड़ की एक कथा प्रतिभिज्ञ दर्शन का अच्छा उदाहरण है।

शेरनी ने नवजात शेर को जन्म दिया, जब वह शिशु कुछ ही दिनों का था तब गीदड़ों के झुंड ने शेरनी पर हमला कर दिया। शेरनी अनेकों प्रयासों के बाद भागने में सफल हुई, परंतु शिशु को ना ले जा सकी। शिशु भागने में असमर्थ था इसलिए वह अपनी माँ के साथ ना जा सका। उस शिशु को देख कर गीदड़ों में वात्सल्य उत्पन्न हुआ और उन्होंने उस बच्चे का पालन पोषण करने का निर्णय किया। गीदड़ों के साथ रहने के कारण वो शिशु गीदड़ों की प्रवृत्ति के साथ बड़ा हुआ। उसकी बोली भी गीदड़ों की सी हो गई। एक रोज़ जब शेरों ने गीदड़ों के झुंड पर हमला किया और शेर को उनके समूह का हिस्सा पाया तब उन्हे आश्चर्य हुआ। उन्होंने शेर को गीदड़ों से अलग किया और उसे झील में उसका प्रतिबिंभ दिखाया। अपने असली रूप को देख कर शेर ने अपनी नैसर्गिक दहाड़ मारी और शेर की प्रवृत्ति का आह्वान किया।

कश्मीर शैव में ये कहानी नहीं है पर वे इसी प्रतिभिज्ञता की बात करते हैं, ये कहानी प्रतीकात्मक मालूम होती है। अपने प्रयासों से पहले खुद को शुद्ध करना होगा, फिर गुरु कृपा से हमें हमारे स्वरूप के दर्शन होंगे। वेदांती और कश्मीर शैव दोनों में कुछ संयंताएं भी हैं, दोनों अंतः करण की शुद्धता पर जोर देते हैं। तपस्या का उद्देश्य ही अपने आप को शुद्ध करना है। गुरु की वाणी प्रकाशमान है, हमें प्रकाश को ग्रहण करने योग्य पात्र बनना होगा। इसी प्रकाश के बाद जीव को वो अवस्था प्राप्त होती है जब वो कहे शिवोहम।

ज्ञान का प्रकाश ग्रहण करने के लि���, शिव के गुणों का ज्ञान करना होगा। प्रतिभिज्ञ दर्शन के अनुसार शिव के दो स्वरूप हैं, प्रकाश और विमर्श। प्रकाश से जो छाया पड़ती है वो विमर्श है।

फ्रायड का consciousness और unconsciousness का सिद्धांत प्रतिभिज्ञ दर्शन के प्रकाश और विमर्श से मेल खाता है। छाया या unconsciousness के अंदर सभी दमित इच्छाएं रहती हैं। शिव से मिलने के लिए हमें विमर्श को भी जानना होगा। प्रकाश को शिव और छाया को काली भी कहा जा सकता है। प्रकाश तत्व की उपमा, दर्पण से भी दी जाती है। शिव तत्व जगत को प्रकाशमान कर देता है।

· शिव – कल्याणकारी

· शंभु – शमन / शांत करने वाला

· शंकर – शम करोति, बुरी इच्छाओं का शमन कर मन को शुद्ध करने वाला

कश्मीर शैव मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। यदि हम स्पंद शक्ति से विलग हो गए तो हम जड़ हो जाएंगे।

कश्मीर शैव एक ही त्रिक तक सीमित नहीं है, और भी त्रिक हैं, इन त्रिक से महात्रिक का निर्माण होता है।

· पर त्रिक – शिव, शक्ति और शिव शक्ति का समागम। शिव + शक्ति

· अपर त्रिक – शिव, शक्ति और नर

· परापर त्रिक – अपर त्रिक की आदिष्ठतरी देवियाँ शिव की महाशक्ति बन जाती हैं और परापर त्रिक का निर्माण करती हैं

पर, अपर और परापर त्रिक का समूह महात्रिक बन जाता है।

कश्मीर शैव में कुछ बीज मंत्र लिए गए हैं जिन्हें षट-अर्ध कहा गया है। हिन्दी वर्णमाला के छह अक्षर अ, आ, इ, ई, उ, ऊ ले कर शिव की शक्ति का व्याख्यान क्रमशः किया गया है।

· अ – अनुत्तर – आधार शक्ति· आ – आनंद – आधारित शक्ति· इ – इच्छा शक्ति – आधार शक्ति· ई – ईषणा (कामना) – आधारित शक्ति· उ – उन्वेष – आधार शक्ति· ऊ – उर्मि – आधारित शक्ति

इन सभी शक्तियों के मेल से शिव का स्वरूप बन जाता है। अभिनवगुप्त ने एक एक शब्द का व्याख्यान तंत्रालोक में विस्तार से किया है।

आपका पथ प्रशस्त हो।