#26

हिन्दू-शब्द

हिन्द के सितारा

यौवन··हिन्दी

आरम्भ में ही बड़ी कठिनाई हमारे सामने यह आती है कि 'हिन्दू' किसे कहा जाए।

जिन दिनों भारत में हिन्दू-मुस्लिम फ़सादों का चक्र जारी हुआ और कई स्थानों के हिन्दुओं पर बड़े बड़े अत्याचार हुए तब पण्डित मदनमोहन मालवीयजी ने बनारस में हिन्दू नेताओं को एकत्र किया और हिन्दू-संगठन के आन्दोलन की नींव रक्खी। इस अवसर पर हिन्दू-शब्द का लक्षण करना आवश्यक था, इसलिए निर्णय किया गया कि हिन्दू वह है जो हिन्दुस्तान में उत्पन्न हुए किसी मज़हब का माननेवाला हो। इसका अभिप्राय यह था कि न केवल भारतवर्ष के प्रत्युत बर्मा, स्याम (थायलैंड) आदि देशों के बौद्ध और जैन भी हिन्दू ही समझे जायें।

इन दोनों लक्षणों में मजहब का अधिक आश्रय लिया गया है। मैं समझता हूँ कि हिन्दू-शब्द जाति-वाचक है। इसका मजहब से कोई सम्बन्ध नहीं इसलिए इसका उत्तम लक्षण वह है जो श्रीयुत विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी पुस्तक 'हिन्दूत्व' में किया है। उनका कहना है कि हिन्दू वह है जो भारतवर्ष को अपनी पितृ-भूमि तथा पुण्य-भूमि मानता है। यदि हम इस शब्द की उत्पत्ति और पिछले इतिहास पर एक दृष्टि डालें तो मालूम होगा कि केवल यही लक्षण हिन्दू-शब्द पर ठीक घट सकता है।

इस शब्द की उत्पत्ति के संबन्ध में लोगों के अन्दर कई प्रकार के सन्देह पाये जाते हैं। कहा जाता है कि हिन्दू-शब्द किसी संस्कृत-प्रन्थ में नहीं आता। इस शब्द के अर्थ चोर, क़ाफ़िर, भीरु आदि हैं, इसलिए जब मुसलमानों ने इस देश को जीता तब लोगों को घृणित समझ कर उनको इस अपशब्द से बुलाना आरम्भ किया। इस खयाल को मैं बिलकुल गलत समझता हूँ। मुसलमानों के आने से पूर्व चीनी यात्री इस देश में आये। उनसे भी एक हजार बरस पहले यूनानी आये और यूनानियों से भी चिर काल पहले इस देश का ईरानियों से गहरा मेलजोल था। ईरानियों के धर्म-ग्रन्थ जंद अवस्ता में यहाँ के लोगों के लिए हिन्दू-शब्द आता है। कारण यह है कि सिन्धु-नदी से, जो एक समय इस देश को ईरान से जुदा करता था, इस पार के रहनेवालों का नाम 'सिन्धु' पड़ गया। ईरानी-भाषा में संस्कृत का 'स' 'ह' से बदल कर 'सिन्धु' 'हिन्दु' बन गया। यूनानियों ने 'ह' को छोड़ दिया। ' इससे 'हिन्दु' 'इन्दु' बन गया। इसी 'इन्दु' शब्द से इन्द (Ind), इंडिया, इंडियन आदि शब्द निकले हैं। इटली का प्रसिद्ध कवि बर्जिल इस देश का वर्णन इन्द (Ind) नाम से करता है। इसी लिए यह कहना कि मुसलमानों ने हमको हिन्दू-नाम दिया, बड़ी भारी भूल है। पहला मुसलमान आक्रमणकारी महमूद अपने साथ अलबरूनी-नाम के एक बड़े विद्वान् को लाया। अल्वरूनी ने हिन्द पर अरबी-भाषा में एक बड़ी पुस्तक लिखी। इस किताब में अलबरूनी बार बार लोगों की हिन्दू-नाम से प्रशंसा करता है। इसमें हिन्दुओं के लिए लेशमात्र भी घृणा का भाव नहीं पाया जाता।

उत्पत्ति को छोड़ कर यदि हम इस शब्द के इतिहास को देखें तब भी यही प्रतीत होगा कि न केवल विदेशियों ने प्रत्युत देशवासियों ने भी हिन्दू नाम का प्रयोग बड़े अभिमान के साथ किया है। चीनी यात्री ह्वेनसांग जो सातवें शतक में भारत में आया, इस शब्द पर टीका करते हुए एक जगह लिखता है कि हिन्दू-शब्द वास्तव में इन्दु है, जो चीनी-भाषा में इन्तु कहा जाता है और जिसका अर्थ चाँद है। जब सारी पृथ्वी पर अन्धकार छाया हुआ था, आकाश के तारों की मध्यमसी झलक इस अन्धकार को न हटा सकती थी,  तब इस देश ने पृथ्वी पर चाँद के समान प्रकाश फैला दिया। इसी लिए वहां के रहनेवालों को इन्दु (हिन्दु) कहते हैं और इस देश का नाम हिन्दुस्तान है। अपने देशवासियों में चन्दद्वरदाई ने अपनी पुस्तक पृथ्वीराजरासो में हिन्दू-शब्द का उल्लेख किया है। उसमें पृथ्वीराज ‘हिन्दू-अधिपति'  से संबोधित किये गये हैं। इसी प्रकार महाराणा प्रताप के जीवन में कमजोरी की एक घड़ी देखते हैं, जब महाराणा ने अकबर को सुलह के लिए चिट्ठी लिख भेजी। बीकानेर का राजकुमार पृथ्वीराज अकबर के दरबार में रहता था। इस चिट्ठी को देखकर वह अकबर से कहने लगा कि यह पत्र प्रताप का नहीं है। मैं प्रताप को एक पत्र लिख कर इसका पता लेना चाहता हूँ। यह पृथ्वीराज कवि था। उसने मारवाड़ी बोली में एक कविता-द्वारा महाराणा से अनुरोध किया कि तुम अकेले हिन्दुओं की नाक हो। सारे देश के हिन्दुओं की आँखें तुम्हारी ओर लगी हैं। इस म्लेच्छ के तेज के सामने शेष सब मात पड़ गये हैं। केवल एक महाराणा प्रताप है जो सूर्य के समान चमक रहा है। हिन्दू-जाति की लाज प्रताप के हाथ में है। क्या यह आश्चर्य नहीं है कि प्रताप भी जाति की लाज खो देने पर तैयार हो रहा है। इसी प्रकार जब औरंगजेब ने हिन्दुओं पर अत्याचार करना शुरू किया तब कहा जाता है कि उदयपुर के ही महाराणा  राजसिंह ने औरंगजेब को एक चिट्ठी लिख कर कहा कि खुदा हिन्दू और मुसलमानों का एक ही है। हिन्दू मन्द्रिों में उसे याद करते हैं, मुसलमान मस्जिदों में। साधु और ब्राह्मणों को, जो चीटियों के समान हैं, क्यों तंग करते हो?  मैं हिन्दू-जाति का सरदार हूँ,  इसलिए तुम्हारा कर्तव्य है कि पहले मुझ पर जज़िया लगाओ। राजपूतों के इतिहास में ये दृष्टांत स्पष्ट बताते हैं कि समस्त जाति अपने आपको हिन्दू कहने में बड़ा अभिमान समझती थी।

इस नवीन युग में हिन्दू-शब्द पर दो ओर से आक्षेप किये जाते हैं। एक ओर तो कांग्रेस-बादी हैं जो अते हैं कि हिन्दू एक फ़िरक़ा है। प्रथम तो मैं इस कथन को इसलिए व्यर्थ समझता हूँ कि एक बहुत बड़ी संख्यावाली और एक बड़ा ऊँचे दर्जे का बूत रखने वाली जाति को फ़िरक़ा या कॉम्युनिटी (Community) कहना निपट मूर्खता है। और,  यह नीति बिल्कुल गलत है कि मुसलमानों या ईसाइयों को जाति के अन्दर सम्मिलित करने के लिए हम एक महान् जाति के नाम और

उसके अन्दर से जातीयता के भाव को नष्ट कर दें। इसके सम्बन्ध में दूसरी बात मैं यह कहना चाहता हूँ कि हिन्दुस्तानी या इंडियन नाम रखना फिजूल है, क्योंकि हिन्दुस्तान का अर्थ हिन्दुओं के रहने का स्थान है। 'हिन्दुस्तानी' का अर्थ हिन्दुओं के निवास-स्थान में रहनेवाले के हो जाते हैं और यह एक निरर्थक बात बन जाती है। वास्तव में हिन्दू और हिन्दुस्तानी का एक ही अर्थ है। जो मुसलमान हिन्दू या ईसाई कहलवाना नहीं पसन्द करते वे मुसलमान नाम छोड़ कर हिन्दुस्तानी कहलवाना भी न पसन्द करेंगे। इंग्लैंड के लोग अपनी जाति इंग्लिश बताते हैं, जर्मनी के जर्मन। यदि मुसलमान अपना पृथक् मज़हब रखते हुए अपनी जाति हिन्दू बताने लगे तो इसमें कोई हर्ज नहीं मालूम होता। लेकिन वे ऐसा तब करेंगे जब अपनी क्रौमियत या जातीयता को मजहब से पृथक् करना सीखेंगे। जब तक उनकी क़ौमियत उनके मजहब में है तब तक वे न हिन्दू-नाम स्वीकार करेंगे, न हिन्दुस्तानी। मैं यह बात कई अवसरों पर देख चुका हूँ कि अन्य देश, जैसे अमरीका आदि के रहनेवाले, 'हिन्दू' जाति का नाम सममते हैं। मेरा मित्र जब अमरीका में था तब उससे एक अमरीकन सज्जन ने पूछा-क्या सभी हिन्दू मुसलमान होते हैं? कारण था कि वह पहले हिन्दुस्तानी मुसलमानों से मिल चुका था जिन्होंने उसे बताया था कि वे हिन्दुस्तान के रहनेवाले हैं और, जैसा कि अमरीकियों में दिमाग है, उन्हें हिन्दू समझता था।

दूसरा आक्षेप उन लोगों की ओर से किया जाता है जो यह कहते हैं कि 'हिन्दू' संस्कृत का शब्द नहीं है। हमारा वास्तविक नाम 'आर्य' है। इसके विषय में मैं यह कहना चाहता हूँ कि 'आर्य' जाति का नाम नहीं है, किन्तु उस नस्ल का नाम है जिसमें ईरानी, यूनानी, स्कैंडेनेवियन, जर्मन, अँगरेज आदि सम्मिलित हैं। इसी लिए हम भारतवासी इंडोआर्यन अर्थात् हिन्दू-आर्य कहे जाते हैं। केवल आर्य कह कर हम अपनी जाति को अन्य जातियों से भेद नहीं कर सकते, इसके अतिरिक्त आर्य-शब्द वेदों तथा शास्त्रों में जहाँ कहीं आया वहाँ इसका अर्थ श्रेष्ठ मनुष्य है। वेद मनुष्य को आर्य और दस्यु, अर्थात् अच्छे और बुरे दो भागों में बाँटते हैं। कल्पना-स्वरूप यदि हम जाति का नाम हिन्दू की जगह आर्य ही मान लें तो इसका फल यह होगा कि दक्षिणी भारत के समस्त द्रविड जो अपने आपको हिन्दू मानते हैं, आर्य जाति से बाहर हो जायँगे। और, क्योंकि आर्यसमाज के प्रचार के, कारण 'आर्य'-शब्द आर्यसमाजियों का-सा बन गया है इसलिए आर्यसमाजियों को छोड़ कर अन्य हिन्दू इस शब्द को ग्रहण करने पर तैयार न होंगे, मुसलमानों का तो कहना ही क्या जो अनापत्तिजनक 'हिन्दू' शब्द से घबराते हैं।

इंक़लाब ज़िन्दाबाद