निर्झर
रश्मि के आदेश मात्र से निर्झर का जल निथराया कविता ने एक मौसम चाहा पाई मौसम की छाया
ARTIST:KAILASH RAJ WATERCOLOR ON PAPER
प्रिय पाठक
कड़ी! हर कविता किसी भाव, कहानी, मूल्य, और किसी अन्य कविता की कड़ी में होती है।
जैसे जीवन की कविता कि कड़ी। ये कड़ी ना जाने कितनी ही लम्बी हुई जाती है। मेरा मानना है, ये कड़ी इतनी विस्तृत है कि इसका आरंभ परमात्मा से, और अंत परमात्मा तक है।
यानि हम सब, जाने-अनजाने, निष्ठा-अनिष्ठा से परमात्मा से जुड़े हैं। जैसे किसी शब्द के अर्थ को जानने के लिए, दूसरे शब्द का होना और उसके अर्थ का सार्थक होना जरूरी है, वैसे ही परमात्मा और हम एक दूसरे से जुड़े हैं।
हम कहते-सुनते हैं “परमात्मा सर्वव्यापी हैं”, यदि हम इस भाव को अलग दृष्टि से देखें और विचार करें तो हम देख पाते हैं कि, किसी भी भाव या विचार में, अंतर्विरोध और असंगति होती है। भाव और शब्दों को एक निश्चित अर्थ में बाँधने के बजाय, विघटनवाद से दिखाई देता है कि किसी भी बात के कई संभावित अर्थ हो सकते हैं। उद्देश्य, मुख्यतः भाव में छुपी हुई संरचनाओं और धारणाओं को, उजागर करना है। परमात्मा के बारे में विचार करने का अर्थ ही है अपने लिए, अनगिन आयाम खोज लेना। परमात्मा और हमारा मिलन, हमारे सूक्ष्म से सूक्ष्म विचार में है और हमारी चेतना की सीमाओं के परे भी।
जब प्रकृति और पुरुष, एक दूजे के पूरक, एक साथ आते हैं।
सरिता के घट अमृत पनपा
जीवंत लहर के मन में प्यार
हंसों ने मन मोती जोड़े
जोड़े तीर-तीर से तार
रश्मि के आदेश मात्र से
निर्झर का जल निथराया
कविता ने एक मौसम चाहा
पाई मौसम की छाया
समय कल्प में सोता है और
कल्पवृक्ष के नीचे मन
ना जीवन का विस्तार यहां
यहां ना कोई अतिरंजन
मानव जीवन के व्रत में
आषाढ़ निरंतर पड़ने वाले
ईश्वर, धर्म और कविता
समता से गढ़ने वाले
इन सब लोगों में है जीवन
जीवन की छांह घनेरी है
कर अमृत, है आशावादी
और इच्छाएं बहुतेरी हैं
- यौवन