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सिय का स्वयंवर

स्वयंवर जब था सिय का वीर सब आतुर हुए जीतने को कीर्ति यश तब हो राजसी तत्पर हुए

यौवन··हिन्दी

image श्री राम दरबार : चित्रकार - अज्ञेय मैंने बहुत कम किताबें पढ़ी हैं, साहित्य का भी ज्ञान बहुत कम है। कुछ मालूम है तो थोड़े बहुत लेखकों के नाम और एक-आधी कविताएं। इसी आधे-पौने ज्ञान के बूते पर मुझे ये कहने में कोई झिझक नहीं होती की, आजकल सारे संसाधनों और अनगिन अवसरों के बाद भी नए लेखक लेखिकाएं कुछ सीखने से वंचित हैं। आजकल साहित्यिक विधाओं में महिलाओं का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है पर हैरानी की बात ये है की उन सभी देवियों के प्रदर्शन के बाद ये स्पष्ट हो जाता है की कुछ-एक हीं अपने लेखन के साथ न्याय कर पा रही हैं। महिलाओं का महिलाओं के बारे में बस वो लिखना जो संवेदनाएं बटोरने के लिए है, खुद को पिछड़ा, प्रताड़ित दिखाना और दोहरी बातें करना। ये लिखते समय मेरे भाव पूर्ण रूप से स्पष्ट हैं और मुझे आभास है की बहुत सी महिलाएं, प्रताड़ित और लाचार हैं। मेरा ये सब कहना मुझे इसलिए उचित लग रहा है क्योंकि, आज के आधुनिक युग में, हम प्रगति की ओर अग्रसर तो हैं, परंतु हम अनोचित राह से अपने लक्ष्य को पाना चाह रहे हैं। आज कल जो भी फेमिनिस्ट साहित्य के नाम पर लिखा जा रहा है, वो सब एक सेकन्डेरी सोर्स, सेकंड-थर्ड-फ़ोर्थ हैन्ड इनफार्मेशन और कही सुनी बातों पर आधारित है। असल जीवन में महिलाओं की दिक्कतें, उनकी परेशानियाँ, उनकी ताक़त, उनकी कमज़ोरियाँ, उस सब से बहुत परे हैं जो मेरी समकालीन कवयित्रियाँ लिख रहीं हैं। ये सब प्रपंच बस लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए है, मेरा मेरे पाठकों से अनुरोध है की इस बकवास को साहित्य ना कहिए और ना इसे प्रोत्साहन दीजिए।

यदि ये सब पढ़ कर किसी के हृदय में सवाल उत्पन्न हों और ऐसी बातें ज़ेहन में आयें, की “इसे महिलाओं के बारे में क्या पता, इसके पास क्या हक है कुछ ऐसा लिखने कहने का” तो जान लीजिए की मेरे भी जीवन में देवियाँ हैं, मैं भी इसी धरा पे जन्मा हूँ।

मैंने कुछ समय पहले रामायण पढ़ी, उसे पढ़ने के बाद एक कविता हुई जो असल कथा से कुछ अलग है। मेरी तरफ़ से फेमिनिस्ट लिटरेचर की एक छोटी सी पेशकश। ये एक ऐसी घटना है जिसके बारे में लिखने का मेरा मन बहुत समय से था।

स्वयंवर जब था सिय का 
वीर सब आतुर हुए 
जीतने को कीर्ति यश तब 
हो राजसी तत्पर हुए 

सज गई मिथिला दुल्हन सी 
माँ सिया सजी बाद में 
एक इच्छा थी जनक की  
आराध्य शिव की याद में 

जीतना गर है सिया को
तो ये धनुष दो टूक हो 
करके जतन तुम हार कर  
क्षत्रिय सभा में मूक हो

कुछ विवेकी थे वहाँ 
तो कुछ वहाँ बलहीन थे 
जो योग्य होने थे सभा में 
आराधना में लीन थे 

अपने अपने इष्ट को 
कर याद वीर बढ़ने लगे 
पहले बल से काम ले कर 
नए प्रयोजन गढ़ने लगे

शस्त्र कौशल तब मौन था 
और ज्ञान न संबल हुआ 
वीर तो लज्जित हुए 
भाग्य भी दुर्बल हुआ 

वीर प्रस्तुत हो सभा में
करके जतन जब हारते 
तब मिथिला राज अपने
रिक्त होते पुण्य को स्वीकारते 

उस सभा में सबके सम्मुख 
अडिग यश कीर्ति धरी रही
आवेश में बोले जनक तब 
पावन धरा भी वीर रिक्त हो गई 

आवेश में राजा जनक तब 
इस व्यथा में चिंतित हो गए 
क्यूँ थी मेरी मूर्खता ये 
क्या आराध्य लज्जित हो गए 

ये शिव धनुष पिनाक है 
जिस से सिया थी खेलतीं 
बस, एक रोज धारण कर लिया 
फिर कोई वस्तु ना थी मेल की 

मौन थे जनक, 
अंतस में ही कहीं खो गए 
फिर पुतलियाँ बड़ी हो गईं 
नेत्र सजल हो गए 

यह देख कर,

तत्क्षण जानकी करुणानिधि 
त्याग अपने स्थान को आगे बढ़ीं 
पितु प्रेम में हो कर समर्पित 
बन शक्ति सी हो गई खड़ी  

जिस धनुष को धार शिव ने 
था कभी भीषण रण किया 
स्वयंवर की उस सभा में 
मां सिय ने धारण किया

आराध्य शिव को नमन कर 
पावन करों में सज्जित कर लिया 
शक्ति ने तब जीत कर 
शिव को अविजित कर दिया 

-यौवन