प्रवृत्ति की परीक्षा
किसी मोह में व्याकुल होकर किसी रोज़ शोकाकुल होकर सूरज तुम भी मानस होना
The Sun-God On His Seven Horse Chariot by D. Lakshmamm
कुछ रोज़ पहले एक इम्तिहान में मैंने हाज़री दी। हाज़री देने का सबब, नौकरी, नौकरी कैसी? जैसी हमेशा से चाही थी। ज़ाहिर है उस इम्तिहान में मेरे अलावा ता’लीम के मे’यार पर मुझसे ज़्यादा ज़हीन लोग बैठे थे। मैं ये इम्तिहान एक बार पहले भी दे चुका हूँ, बीते बरस मैंने जब ये इम्तिहान दिया तब मैं बहुत विचारों से घिरा हुआ था। फ़ेल होने के विचार, एक और बार फिर यही इम्तिहान देने का विचार। इसी डर में मैंने इम्तिहान दिया और जैसा की होना था, मै फ़ेल हो गया। इस बार जब मैं वही इम्तिहान देने गया तब तक मेरे जीवन में मुझे नई ऊर्जा, विश्वास और उम्मीद मिल गई थी। इस बार इम्तिहान मैंने बेफ़िक्र हो कर दिया। इम्तिहान के 2 भाग थे, एक अंग्रेजी और एक सामान्य ज्ञान। अंग्रेजी का भाग पहले 2 घंटों में इतमिनान से पूरा करने के बाद बड़ा सुकून मिला। दूसरे भाग में सब प्रश्न पढ़ कर, समय समाप्त होने से पहले अपने ज्ञान और अनुमान अनुसार प्रश्नों के उत्तर देने के बाद मैं साहित्य के बारे में सोचने लगा। मैं अपने खाली समय में अमूमन कविताओं के बारे में सोचता हूँ, किसी कविता के सारांश को याद करता हूँ। वैसे इस इम्तिहान का नतीजा भी ये हुआ की मैं इसमे फ़ेल हो गया। पर इस इम्तिहान में बैठे-बैठे एक कविता हुई। उस कविता को मैंने अपने प्रश्न पत्र के पीछे लिखना शुरू किया, और ये कविता अपने आप रूप लेती गई। ये लिखने का इरादा महज़ ये लिखना है कि मेरी प्रवर्त्ति, मेरी आदत कविताएं लिखना है और वो भी बेहतरीन। किसी से कोई मुक़ाबला नही है, मेरा कोई मुक़ाबिल नही है।
किसी मोह में व्याकुल होकर
किसी रोज़ शोकाकुल होकर
सूरज तुम भी मानस होना
इसी धरा पे पल पल रोना
छोड़ के ऊपर पीत तुम्हारी
लाखों वर्षों की रीत तुम्हारी
सूरज तुम भी मानस होना
इसी धरा पे पल पल रोना
किसी नीम से टेक लगा कर
किसी त्रास को रोकर गाकर
मुझ जैसे ही मानस होना
भूल भी जाना सूरज होना
इस दुनिया में घूम घामकर
इच्छाओं के अमर सफर पर
तुम भी थोड़ा तो चल लेना
कुछ राह मुताबिक भी ढल लेना
बैठ शिखर पर तुम भी रोना
जी पाओगे मुझ सा होना
- यौवन