भोर का राजकवि
मिला क्या न मुझको ए दुनिया तुम्हारी, मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे।

ज़मीं खेत की साथ लेकर चला था,
उगा उसमें कोई शहर धीरे-धीरे।
मिला क्या न मुझको ए दुनिया तुम्हारी,
मोहब्बत मिली, मगर धीरे-धीरे।
- डॉ॰ रामदरश मिश्र
कुछ अजेय लोग जिन्होंने जीवन भर साहित्य को सींचा, लेख लिखे तो उम्दा लिखे, कविताएं लिखीं तो पुर-ज़ोर। जिन्होंने नव-रस के अतिरिक्त सैकड़ों ज़मीनों* पे लिखा, ऐसे ही लोगों में शुमार हैं श्री रामदरश मिश्र । एक शाम दुनिया के अव्वल बुक्स्टोर में नयीं किताबें खोजते समय मेरी दृष्टि, रामदरश मिश्र जी के एक कविता संग्रह पर पड़ी। उस काव्य संग्रह के आवरण के बारे में सबसे मोहक बात थी उस पर मिश्र जी की तस्वीर। उस तस्वीर में ना जाने मिश्र जी इतनी संतुष्टि से किसे निहार रहे थे। मैंने जैसे ही किताब के कुछ प्रष्ठ पलटे और एक दो कविताएं पढ़ीं, मुझे आभास हो गया था ये कोई रोज़ सामने आने वाली किताब नहीं है, ये तो नसीब से सामने आई है। मैं ये बात इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मैं और मेरे मित्र अभी सीखने के सफ़र पर हैं, जब कोई राह सामने स्पष्ट ना हो और ना कोई बताने वाला हो तब हम जिस राह पर अग्रसर होते हैं वो महज़ सीखने की राह होती है। ऐसे में ही यदि एक गुरु हो, तो मंजिल नज़र आने लगती है।
जमीन से जुड़े इन कविराज को मैंने दिल लगा कर पढ़ा, समझने की कोशिश की, और इसी दौरान कुछ कविताएं हुईं। इनमे मिश्र जी की कविताओं के शायद अंश हैं जो मुझे संतुष्टि देते हैं। मिश्र जी का जन्म 15 अगस्त 1924 को हुआ, अब उनकी उम्र 99 वर्ष है। मैं उनके अच्छे स्वास्थ्य की कामना करता हूँ और उनकी अमरता को पहचानता हूँ। मिश्र जी को पढ़ते समय हुई एक कविता नीचे जोड़ रहा हूँ।
सुनो भोर के राजकवि
तुम जन्मशति तक मत जाना
इस धूल धरा के सृजनवीर
जीवन पर तुम भी मुस्काना
इतने वर्षों तक जीवन को
तुमने जो गीत महान दिए
दिनकर, रश्मि, सरिता को देखा
और उनको सम्मान दिए
सब कविताओं के अंश खुलें
यही चाहा तो होगा मन में
कितना निष्ठुर होता है सच
जीवन पाषाण सघन में
लग शत वर्षों में तुमने बोला
नहीं हुआ कभी था व्यर्थ वही
अब और समा है और लोग हैं
अब कुछ कहने का अर्थ नही
इन सब के बदले आशा है
तुम्हे जीवन से उपहार मिले
जो लोग धरा पर दे ना सके
वो नारायण से प्यार मिले
- यौवन
ज़मीनों* - खयालों