काम
चित्त चेतना भरी मृत्यु का वो दास था चित्त में थी सुंदरी काम का जो ग्रास था
Green-complexioned Kama, who kneels on his parrot-drawn chariot while aiming his flowery arrow of love
मैंने अपने जीवन में अब तक बहुत कम जगह सफ़र किया है। मेरा कहीं जाना अमूमन काम ही की वजह से हुआ है। अब जो कि काम मेरे पास है नही, ये भी एक कारण है मेरे कहीं ना जाने का। पर कहीं जाने के लिए, घूमने के लिए, काम की क्या जरूरत, उसके लिए तो हृदय की इच्छा ही बहुत होती है? पर मेरे साथ तो वो सहूलत भी नहीं। ख़ैर, मुझे समय-समय पर फ़ितरतन मौके मिलते रहे हैं जो की मैं स्वीकार भी करता रहा हूँ। मुझे कहीं घूमने फिरने से गुरेज़ नहीं है, मुझे तो मज़ा आता है नए अनुभव लेने में और नए लोगों से मिलने में। बहर-हाल मुझे बीते बरस नवंबर में, धर्मशाला जाने का मौका मिला। हर वर्ष धर्मशाला अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव नवंबर में होता है और यहाँ देश-विदेश से लोग और फिल्में दोनों की भरमार होती है। यहीं मुझे एक स्वयंसेवक के तौर पर जाने का अवसर मिला। उस दौरान मेरी पढ़ाई पूरी हो गई थी और मैं बहुत समय से घर पर था, सो मैंने वहाँ जाने का मन बना लिया। महोत्सव के दौरान मुझे बहुत प्रतिभाशाली, कर्मठ और निष्ठावान लोग मिले जिनके अनुभवों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला, और महोत्सव ख़त्म होते-होते बहुत नए दोस्त भी बन गए। उन सभी दोस्तों को प्रणाम, मैं ये लिखते समय आप लोगों को स्मरण कर रहा हूँ।
तय्यारीयों और महोत्सव के दौरान जब कभी मुझे समय मिला, तब मैंने कविताएं भी लिखीं। एक शाम, बातों के दौरान मैंने अपने एक दोस्त से कुछ ख़्याल साझा किए। मेरे मित्र विपिन, जो कि साहित्य में रुचि रखते हैं, तथा नाट्यशास्त्र और लेखन के ज्ञाता हैं, उनसे बातों के दौरान एक कविता का जन्म हुआ। हम ‘काम’ के विषय में बात कर रहे थे तभी मैंने दो-चार पंक्तियाँ लिखीं। उन पंक्तियों को सुन, विपिन भाई ने उनमे इज़ाफ़ा करते हुए एक छंद कहा, उस छंद को लिख कर मैंने एक और छंद लिखा, ये सिलसिला कुछ 3-4 छंद और चला। उसके बाद मुझे किसी कारणवश वहाँ से जाना पड़ा। ये कविता मैंने अगली सुबह पूरी की। ये कविता इसलिए जन्मी क्योंकि धर्मशाला में मेरा अनुभव उससे मेल खाता था, जो कहानी मैंने सुनाई वो कहानी मेरी ही थी, पर लिखते समय उसे कोई और दिशा दे कर किसी और कहानी में ढाल दिया।
महोत्सव के दौरान दो कविताएं हुईं। पहली कविता:
काम
तन्हा दिलों की छांव में
दूर एक गांव था
सरल प्रव��ह जल का था
शीतल हवा बहाव था
ऐसा कोई था वहां
जिसका वो आवास था
नेत्र भी थे जल भरे
भोर का प्रकाश था
एक स्वर में राग था
मीत या वैराग था
सोचता था काल को
कितना वो अभाग था
चित्त चेतना भरी
मृत्यु का वो दास था
चित्त में थी सुंदरी
काम का जो ग्रास था
प्रावृट था प्रत्यक्ष में
अंतर में घमासान था
भीतर जो युद्ध चल रहा
बस हारना आसान था
भावनाएं थीं हृदय में
किस में इसका दोष था
प्रकाश जानता था वो
प्रथक क्या संतोष था
अंतर और प्रत्यक्ष में
थी समिधा गल रही
महायोग चल रहा
सृजन शक्ति जल रही
इतनी सिद्धि थी ��हां
कुछ भी कमी न रह गई
काल माला जप रहा
मृत्यु भी कुछ कह गई
लोग मूक थे सभी
जो दृश्य उसका पाते थे
देवता भी हारते
करने अरज वो आते थे
काम देव ही था जो
सबसे कठिन था जीतना
अपनी सिद्धि से जिसे
कर सका भयभीत ना
काम का तो काम था
की काम की महिमा रहे
हो कलुषित सिद्ध योगी
गौर ना गरिमा रहे
ऐसे हठी थे दोनों ही
की द्वंद्व दोनों में छिड़ा
तीर काम का चला
ध्यान से वो जा भिड़ा
उस के मन में काम ने
प्रवेश ऐसे था किया
जो खो चुका था योग में
ला कर उसे वापस दिया
उसका अंतस ही समर था
जिसमे अलग कुछ बात थी
पुरुष जीवित था वहां
प्रकृति भी साथ थी
देख कर इस दृश्य को
काम कुछ विचलित हुआ
चंचल हृदय बे–ढाल है
यह सोच फिर पुलकित हुआ
फिर छुप खड़ा हो कर
ऊंचे शिखर को जान कर
एक बार फिर लौटा समर में
धनुष बाण तान कर।
-यौवन