स्फुट कविता
अकिंचन
आज सवेरे एक कविता हुई, वो यहाँ है।
आस असाढ़```
लिखूँगा ना तुमको मैं मेरे प्रणय गीत
ना हक़ है तुम्हारा है ना-हक नहीं प्रीत
अकिंचन हुआ मिलना मेरा तुम्हारा
अकिंचन हो तुम मैं अकिंचन तुम्हारा
नए रब्त में झूठ शामिल कई हैं
पुरानी है आदत खरी दिख रही है
तुम्हें गर मैं पूछूँ की ये बात है क्या
खरे तुम जताना की जज़्बात है क्या
गई बात में मैं प्रिये लिख चुका था
खोजो ज़रा तुम लिखा वो कहाँ था
यदि तुमको मिल जाए पद वो प्रिये का
समझ पाओ संदर्भ मेरे लिखे का
लिखना की तुमसे प्रणय नीति क्या है
तुम्हारे लिए ये प्रणय प्रीति क्या है
जैसे है सब कुछ ये भी खेल है क्या
मेरा तुम्हारा कहीं मेल है क्या
ना मिथ्या ये बातें मिथक तुम नहीं हो
अनभिज्ञ हो पर पृथक तुम नहीं हो
ये कविता तुम्हारी तुम्ही नायिका हो
तुम्ही पद प्रिये का तुम्ही नायिका हो
बेहतर है तुमको पुकारूँ प्रिये मैं
करूँ कोशिशें और हारूँ प्रिये मैं
- यौवन