एक फिल्म एक कविता
आज का दिन भी काट लिया है हँसते हँसते कामों में, तेरे ध्यान से बचते बचते शुक्र हुआ ये शाम ढली
यौवन··हिन्दी
Dead Poets Society (Film)
ऊपर लिखा शेर एक बेइंतेहा कमाल शायर का है।
करीब-करीब एक बरस पहले, ये फिल्म देखने के बाद देर रात कुछ खयाल हुए। मुझे याद है वो सर्दियों के दिन थे, मैं देर रात बाम (balcony) पे बैठा करता था, इंशा जी को पढ़ता था। ये फिल्म लिहाज़ा मेरे ज़ेहन में घर कर गई। सूरतन मैं जानता था ये मात्र एक कहानी है, पर कहानी क्या कहूँ बड़ी पुरजोर है। अपने अल्फ़ाज़ में कहानी का एक नमूना लिखा था, वो यहाँ है।
हर ख्वाब का कातिल होता है,
उस ख्वाब का भी एक कातिल था।
वो ख्वाब ज़रा नासाज़ लगा,
पर यूं ना था ला-हासिल था।
उस ख्वाब की गूंज रही दिल में,
और याद मकां कर बैठी थी।
वो हस्ती ही लासानी थी,
जो इश्क बयां कर बैठी थी।
जो ख्वाब मुकम्मल होने हों,
कब इश्क उन्ही से होता है।
जिस रोज़ असीरी तारी हो,
तब इश्क यकीं सा होता है।
ये ख्वाब बड़ा दिलफेक सा था,
इस ख्वाब से उसकी यारी थी।
अगयारों पर खुली नही,
इस ख्वाब की जो तहदारी थी।
ये ख्वाब उसी बेदिल का था,
जिसके रब्त में हम सब रहते थे।
वो जान हमारी बनता था,
सब कहते थे सब सहते थे।
ये ख्वाब इबादत था जैसे,
इस ख्वाब को चाहा दिल से था।
ये ख्वाब ही उसकी मंज़िल थी,
और दूर यही मंज़िल से था।
वो शख्स हमारे दिल सा था,
जिसमे सब राज़ धड़कते थे।
उसके लम्स से रातें सर्द ना थीं,
हर सांस से साज़ धड़कते थे।
हम दरिया हैं जो बहते हैं,
वो साथ सदा एक साहिल था।
ये टीस हमारे दिल में है,
उस ख्वाब का भी एक कातिल था।
सोचा था एक अरसे बाद लिखेंगे,
जब वो याद हमे कम आएगा।
हम रातों को मुसकाएंगे,
वो साथ यहीं मुस्काएगा।
अफसोस ये सारे ख्वाब हमारे,
सब बेकार हमारी बातें हैं।
अपने दिल में टीस लिए,
दुश्वार हमारी रातें हैं।
कुछ लोग हक़ीक़ी जाने हैं,
अंजाम ये कैसे आया था।
खिलते हंसते ख्वाब ने कैसे,
खुद को तन्हा पाया था।
जानने वाले कहते हैं,
एक रात से वो था हार गया।
खुद-सोज़ी की शक्ल में वो तो,
ख्वाब को अपने मार गया।
जिस रात की बातें करते हैं,
उस रात उसे सब ने देखा।
वो सबसे उम्दा, अव्वल था,
उस रात यही सब ने देखा।
हम अनजान नहीं थे कातिल से,
जो ज़ुल्म भी उस पर करता था।
अपनी हार से जो था सहम चुका,
और हार से उसकी डरता था।
ख्वाब को कातिल जानता था,
बे-खुद वो ख्वाब को मान गया।
सब कुछ तब नाकाम लगा,
और सब कुछ तब बेकार गया।
उस रात दरीचे पर नायक ने,
आखिरी अपना ख्वाब कहा।
ख्वाबों की दुनिया को अपनी,
एक ला-हासिल आज़ाब कहा।
सर्द लहू हो गया कत्ल से,
मानो सर्द ज़मीं ने थाम लिया।
सुनने वाले कहते हैं,
कातिल का उसने नाम लिया।
आपका पथ प्रशस्त हो।