मैंने ग़ज़ल कही
संक्षिप्त

लगभग चार बरस पहले, मैंने साहित्य पढ़ना शुरू किया। साहित्य पढ़ने की मेरी शुरुआत शौकिया नहीं, जरूरतन थी, मुझे पढ़ने से ज्यादा लिखने की चाह थी। लिखने से पहले पढ़ना बड़ा जरूरी होता है सो पढ़ना पड़ा। जैसा उस समय समझ और नजर आया, मैंने शुरुआती दौर में अंग्रेजी किताबें पढ़ीं, अब उन अंग्रेजी किताबों में लुत्फ आया नहीं सो एक के बाद एक आधी अधूरी पढ़ कर रखता रहा। उस समय मैं कुछ अटपटी कविताएं भी लिखता था जिनमे कोई कायदा शुमार नहीं था, खैर मुझे कायदे की समझ भी नहीं थी। मुझे याद है मैंने पीयूष मिश्र की किताब ‘कुछ इश्क किया, कुछ काम किया’ एक ही दिन में पढ़ ली थी, यहाँ से क्रांति घटित हुई। अब अटपटी कविताएं बढ़ गईं थीं, और पुरजोर आत्मविश्वास के साथ। अब ये बताते समय चेहरे पर मुस्कान आ जाती है, खैर पढ़ने और लिखने का सिलसिला यहीं नहीं रुका, इसके बाद जौन, ग़ालिब, मोमिन, इकबाल, दाग़ वगैरा-वगैरा। ये सिलसिला अभी तक चल रहा है, इन शायरों और कवियों की फेहरिस्त अब बड़ी लंबी हो चुकी है। इन्हीं सब के साथ-साथ मैंने हिन्दी/हिन्दुस्तानी भाषा को बड़े चाव से पढ़ा चूंकि इनमें मेरी दिलचस्पी थी। शायरों को पढ़ते-पढ़ते अब मैंने 2-2 पंक्तियाँ लिखना शुरू किया जिन्हे अपने अल्पज्ञान के कारण कविता कहा, फिर यदि उनमें कुछ उर्दू के लफ़्ज़ होते तो मैं उन्हें ग़जल की उपाधि दे दिया करता। हौले हौले मुझे पता चला, की मैंने अपनी तथाकथित ग़जल में महज़ काफिया रखा है, रदीफ़ और बहर का उस समय मुझे दूर दूर तक कोई ज्ञान नहीं था। एक दोस्त के बताने पर मुझे पता चला की रदीफ़ क्या होता है, तो मैंने काफ़िया और रदीफ़ के साथ प्रयोग किये। मैं लिखता भी था और पढ़ता भी था, मैंने ऐसे अपने शब्द और उनका चयन करना सीख लिया।
कॉलेज में मेरा एक दोस्त था मोमिन, बेहतरीन दोस्त और अच्छा शयार, एक दोपहर उसके साथ बैठे उसने मुझे ग़ज़ल के कायदे समझाए। कायदा समझाने के बाद उसने मुझे सबसे पहले तकती करना सिखाया और तकती करने का काम दिया। ऐसे मेरा बहर से परिचय हुआ, अब मैंने और सतर्क हो कर हर पंक्ति बराबर लंबी हो इसका ध्यान रखा। प्रयास करते हुए अब मुझे कुछ महीने हो गए थे, और इस दौरान मैंने तकती करना और शब्दों को समझना शुरू कर दिया था। ये ऐसा था जैसे कोई नई भाषा सीखी हो। ऐसे मैंने नई विधा में कदम रखा। अब जब बहर से मेरा परिचय हुआ, तो मैंने लगभग एक बरस पहले, पहली ग़ज़ल कही। अब यदि देखा जाए, तो विधा से मेरे परिचय के 3-4 बरस बाद मैंने पहली ग़ज़ल कही, जो संभवतः ज्यादा समय है। परंतु मेरे लिए यही उचित था, मैं बड़े आत्मविश्वास से कह सकता हूँ की मैंने बहुत पढ़ा है, फिर मुझे लिखना आया, इसमें दोस्तों का सहयोग भी मुझे मिला। मुझे मिले सहयोग का मैं आभारी हूँ। सभी सहायकों और गुरुओं को प्रेम। आजकल मैं सिर्फ़ पढ़ता हूँ और इच्छानुसार लिख लेता हूँ। आज यहाँ लिखने की इच्छा हुई सो लिख दिया।
आपका पथ प्रशस्त हो!