#43

अद्वैत

आदिशांकर के अद्वैत का निचोड़

यौवन··हिन्दी

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विक्रम संवत 2082 के आरंभ की शुभकामनाएं। नववर्ष के अवसर पर आज आदिशांकर के अद्वैत दर्शन का निचोड़।

नेति-नेति

किसी भी वस्तु की ओर देखना और कहना, ये ब्रह्म नहीं है, ये ब्रह्म नहीं है। क्योंकि ये सब सीमित हैं। ब्रह्म निराकार हैं, ब्रह्म अपने आप को प्रकट कर रहा है। ब्रह्म सबसे बड़ा और सबसे परे है। ब्रह्म तुलनात्मक नहीं है। भाषा ब्रह्म के विषय में बाध्य है। भाषा वर्णन करते समय चीजों को विभाजित कर देती है, खंडन करती है और दो में बाँट देती है।

ज़ाक डेरीदा ने अपनी किताब ‘डिफरेंस’ में ‘deconstruciton’ का सिद्धांत दिया है। उस की मदद से हम कह सकते हैं कि भाषा की सीमाएं हैं और उन सीमाओं को हम आंक सकते हैं।

ब्रह्मसूत्र में अनेकों प्रश्नों का उत्तर दिया है, वे सब प्रश्न क्रमशः इस प्रकार हैं।

  • ब्रह्म क्या है

  • आत्मा क्या है

  • ब्रह्म और आत्मा के बीच का परिचय/पहचान

  • सत क्या है

  • आत्मा और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है इसका वर्णन है

  • हम ब्रह्म की ओर कैसे बढ़ सकते हैं

  • आत्मा अपने आप को ब्रह्म कहलाने के योग्य हो जाए

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।

ब्रह्म सत्य – ब्रह्म ही सत्य है, यदि कोई चीज़ सत्य है तो वह ब्रह्म है

जगन्मिथ्या – शाब्दिक अर्थ अलग है, आदि की मिथ्या से भ्रमित नहीं होना। ये नहीं समझना की वे इस दुनिया को मानते ही नहीं। मिथ्या का अर्थ असत नहीं है। सत का अर्थ है जो अस्तित्व में है, असत का अर्थ है जो अस्तित्व में नहीं है। जैसे – मृत जीवन, खुशहाल दुख, बांझ स्त्री का पुत्र। जगत असत नहीं है मिथ्या है। सद-आसद भाव है मिथ्या। मिथ्या सत और असत के बीच कहीं है। माया सद आसद ऐसे है कि जो है तो सत्य, पर झूठ दिखाई देती है या अपने वास्तविक रूप में दिखाई नहीं दे रही है। मिथ्या का रूप बदल गया है। जगत सद आसद है। आदि ने जगत को नकारा नहीं है। उन्होंने कहा है जगत जैसा होना चाहिए वैसा नहीं दिखता। जैसे सूर्य, चंद्र, दोनों सद आसद हैं, जैसे हैं वैसे दिखाई नहीं दे रहे, यही जगत का रूप है।

सत्य – logical truth 2+2=4

आदि का सत अलग हैं, यहाँ सत और सत्य में भेद है। सत का अर्थ है अस्तित्व, ब्रह्म सत है। ये संस्कृत की बृ धातु का शब्द है, बृ का अर्थ है बढ़ना, जो सबसे ज्यादा विकसित है, विस्तृत है, जिसके सिरे का पता नहीं है वो ब्रह्म है। इसके संबंध में अकबर इलाहाबादी का शेर आया

“फ़लसफ़ी को बहस के अंदर खुदा मिलता नहीं
डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं”

ब्रह्म अनंत है, न आदि है। अनंत है तो निराकार है। ब्रह्म परिवर्तनशील नहीं है। हर जगह व्याप्त है, यानि अस्तित्व हर जगह है। यदि किसी वस्तु का अस्तित्व ही नहीं है तो वो होगी ही नहीं। उदाहरण के लिए यदि मैं एक कागज आपको दूँ और कहूँ की ये कागज है लेकिन इसका अस्तित्व नहीं है, तो ये कागज होगा ही नहीं। यदि अस्तित्व नहीं है तो चीज़ भी नहीं होगी, तो “nothingness” होगी। यहाँ शाब्दिक अर्थ और समझ की समस्या है, इसी समस्या को डेरीदा ने बहुत विस्तार से लिखा है। हेगल कहता है यदि कोई वस्तु अस्तित्व से परे है, ‘non existent’ है तो वह ‘nothing’ हो जाएगी। हर चीज़ का अस्तित्व है, जब अस्तित्व सीमित होता है तब वह संसार की वस्तु बन जाती है। जब वह अस्तित्व असीम हो जाता है तब वह बदल नहीं सकता। सांख्य दर्शन प्रकृति के विषय में ही बात करते हैं कि प्रकृति संसार ���ा निर्माण करने वाली है, लेकिन परिवर्तनशील है। प्रकृति रजोगुणी है, यही कारण है कि परिणामवाद का सिद्धांत जटिल है। आदि का मानना है की जिसमें बदलाव आए वह सत नहीं है। सत समय से परे है, त्रिकार में जो सत है वो परिवर्तनशील नहीं है। निर्बाध सत, परम सत ही ब्रह्म है। ब्रह्म में कोई विकार नहीं है, सत सदा ही सत रहेगा। तंत्र पढ़ते समय एक विशेष ध्यान रखने वाली बात यही होती है की जब तुम तंत्र में प्रवेश करते हो तब तंत्र के लिए तुम विकार रहित हो, तंत्र कहता है अपराध बोध, अपराध भाव त्याग दो। तंत्र की तुम्हारी प्रति ये दृष्टि कभी नहीं बदलेगी। ब्रह्म परिवर्तनशील न होने के कारण अविनाशी है। जो सीमित है वो नश्वर है। ब्रह्म में तिल भर भी विकार नहीं है। ना उसमें बदलाव किया जा सकता है ना उसे रिक्त किया जा सकता है। विज्ञान भैरव तंत्र में शिव की ऐसी ही 112 विधियाँ हैं, जिनको न बदला जा सकता है, ना घटाया या बढ़ाया जा सकता है। महज़ अस्तित्व का ही अस्तित्व है, उससे परे कुछ नहीं। ब्रह्म अखण्ड है, कोई आदि अंत नहीं है। न्याय और वैशेषिक कहते हैं सब कुछ अणु से बना है, आदि कहते हैं अणु अलग भी हो सकते हैं। एक अणु को दूसरे अणु से क्या अलग करता है, वह चीज़ क्या भौतिक है या अभौतिक, सत है या असत। यदि सत है तो अलग नहीं सकता, क्योंकि सत को सत से सत कैसे अलग कर सकता है। यदि सत को सत से असत अलग कर रहा है तो असत अपने आप सत हो गया, सत और असत में अंतर ही नहीं रहा कोई।

निष्कर्ष – जो अणु से बना है वो ब्रह्म नहीं हो सकता

ब्रह्म – व्यापक, परम सत्य, अखण्ड, अनादि, काल समय देश की कोई सीमा ब्रह्म के लिए नहीं है।

ब्रह्म – कहाँ, कैसे, कौन से परे है।

जो निर्विकार होता है उसमें गुण भी नहीं होता।

तमोगुण, सतोगुण, रजोगुण से परे है निर्गुण है। भाषा में ब्रह्म का वर्णन नहीं हो सकता, वेद भी नेति-नेति के सूत्र से ब्रह्म की व्याख्या करते हैं। डेरीदा कहता है कि भाषा विभाजन कर देती है, विषय और विधेय में तोड़ देती है, उसे तोड़ने के बाद कोई नया शब्द लाती है। जैसे – गुलाब लाल होता है, लाल गुलाब। अब लाल गुलाब की हम असीम व्याख्या कर सकते हैं, लाल गुलाब खिल गया वगैरा वगैरा।

विषय विधेय में तोड़ने के बाद उसमें क्रिया लगा देते हैं। ना ब्रह्म टूट सकता है, ब्रह्म ज्ञाता, ज्ञेय दोनों है, ब्रह्म ज्ञान भी है क्योंकि उसके अलावा कुछ अस्तित्व में ही नहीं है। ब्रह्म की बस अनुभूति हो सकती है। ब्रह्म अनुभूति है, ब्रह्म निर्गुण होते हुए अपने आप को प्रकट कर रहा है। यह ब्रह्म का स्वरूप लक्षण है। जो अपने आप को व्यक्त कर सकती है वह चित्त भी है। ब्रह्म सत के साथ चित्त भी है। सिर्फ़ एक ही इन्फिनिटी हो सकती है। जो सधा हुआ ब्रह्म है, परिपूर्ण है, वह आनंद का विषय है। ब्रह्म सचिदानंद है।

इसी संबंध में एक कहानी मैंने सुनी थी, उस कहानी को सुनने के बाद उसके सार में तो दिलचस्पी थी ही परंतु एक प्रश्न भी उत्पन्न हुआ। अनेकों कहानियों में जनक के साथ ही क्यों प्रयोग घटित होते हैं। अष्टावक्र का जनक, ऋषि याज्ञवल्क्य का जनक। जनक का बहुत गहरे में कुछ अर्थ है। राजा बड़े अर्थपूर्ण हुए होंगे की जनक जनक हुए। जनक दृष्टा का प्रतीक है। जनक प्रतिभासिक सत्य के दृष्टा थे। सत्य के अलग-अलग पद हैं, जो हम स्वप्न में देखते हैं यदि वह असत होता, तो हमें स्वप्न दीखता ही नहीं। स्वप्न और और जागृत में जो देख रहा है वही सत है। मिथ्या अनुभव से सम तक जाने, ले जाने का प्रयास है। मिथ्या का आधार वही रहता है, ब्रह्म का आधार ब्रह्म ही है। हम अधिरोपण करते हैं, ‘सूपइम्पज़िशन’।

ब्रह्म होगा --- ब्रह्म का सीमित रूप होगा --- उस पर कुछ और सीमित देखने का प्रयास होगा --- दिखाई कुछ और सीमित देगा --- यही मिथ्या है।

रस्सी को सर्प देखना

ब्रह्म अवस्था से परे हैं, आधे सत से परे हैं। अभेद में जो नाम रूप के माध्यम से भेद पैदा कर दे वो मिथ्या है। मिथ्या को पैदा करती है माया। माया का अर्थ है, ‘मा’ का अर्थ है ‘नहीं’ और ‘या’ का अर्थ है ‘जो’। माया भी अनंत है। माया पहले आवरण करती है, प्रलोभन देती है, सत को ढक लेती है। माया का आधार तमस है, अज्ञान है। माया और ब्रह्म में बहुत कुछ समान है। माया और ब्रह्म को तर्क से नहीं जाना जा सकता। माया ने भेद पैदा किए, ये संसार पैदा किया। लकड़ी सत्य है, मेज और कुर्सी नहीं, मेज और कुर्सी के नष्ट होने के बाद भी लकड़ी रहेगी। नाम रूप नश्वर है, अस्तित्व नश्वर नहीं है। माया अज्ञान के कारण ब्रह्म का सीमित रूप दिखाती है।

एक चंद्र

1 2 3 4 5

जल से भरे 5 पात्र जिनमें चंद्र छवि है

यदि एक पात्र के जल को छेड़ा जाए तो अन्य 4 पर उसका कोई असर नहीं होगा, परंतु यदि असली को चंद्र को बदल दिए जाए तो सभी पात्र बदल जाएंगे। इसी प्रकार से माया नश्वरता को जन्म देती है। ब्रह्म ने संसार नहीं बनाया, माया ने बनाया है। ब्रह्म करता और भोक्ता नहीं है। ब्रह्म देख रहा है कि परिवर्तनशील ना होने के बाद भी ये परिवर्तन हो कैसे रहा है? – अज्ञान से।

भेद की दृष्टि माया की, अभेद का ज्ञान ब्रह्म का। माया त्रिगुणात्मक है।

ब्रह्म और जीव एक ही है, आत्मा और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है। हर काल में दोनों का अस्तित्व है, अखण्ड है। यहाँ ‘मॉडर्न वेस्टर्न फिलोसोफी’ की शुरुआत है। ‘कांत’ कहते हैं हमारे अनुभवों को एकत्र करने वाला जो आधार है, वो हर जगह रहता है।

आपका पथ प्रशस्त हो।