उदारता
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती¸ उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।

जो भी जीवित है जीवंत है या जिसमे प्राण है, हमें उससे बोध, वास्ता रखें में कोई बाधा नहीं है। परंतु जिस क्षण वह अपने प्राण त्याग देता है, अपना जीवंत स्वभाव त्याग देता है, उसी क्षण दूरियाँ निर्मित हो जाती है, एक धुरी का निर्माण हो जाता है। उदाहरण के लिए, स्वभावतः हमारे साथ होता है कि यदि हमें कोई निर्जीव पक्षी मिले, तो उसके शरीर को उसके तथाकथित अस्तित्व को उठाने में हमें आपत्ति मालूम होती है। हमारा हृदय उसे हाथ लगाने से घबराता है, हमारा हृदय कितना आशावादी है कि सोचता है कहीं मेरे हाथ लगाने से जी ना उठे। ऐसी बाधाएं अवश्य स्तर पर आती हैं, क्योंकि ये हमारे बहुत भीतर तक हैं। क्या हो यदि हम पूरे अस्तित्व को, पूरे साक्षात को ऐसे ही देखें, समझने के लिए - हमें अपने मेज़ कुर्सी को उठाने हाथ लगाने में कोई बाधा नहीं होती, क्योंकि हम जानते हैं, बहुत गहरे में कि जीवंत हैं, ये जीवित है। यह पढ़ने के बाद यदि ये प्रश्न आए, की वो पक्षी भले ही प्राण त्याग चुका हो, परंतु वो हमारे सामने ऐसे ही है जैसे ये मेज़ काग़ज़ और कुर्सी। इस प्रश्न का एक शब्द का उत्तर है, “बाधाएँ”।
ऐसे ही हमें उन लोगों के आस पास रहने में समस्या आती है जो लोग अपने केंद्र से दूर हैं, जिनके प्राण कम हो गए हैं, उनमें कुछ जीवंत मालूम नहीं होता।
प्रेम आत्मिक होता है, शारीरिक हो ही नहीं सकता!
इस सूत्र को समझने के लिए कुछ अधिक समझने की ज़रूरत नहीं है, बस ये जानना काफ़ी है की यह रूपांतरण है। व्यक्ति रूपांतरण से घबराता है, रूपांतरण से बहुधा यूँ होता है कि कोई वस्तु अपने मूल रूप में चली जाती है। और जो की हम मूल से बहुत दूर हैं, धुरी पर खड़े हैं, हमें मूल को देखने में समझने में मुश्किल मालूम पड़ती है।
जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो कोई कितना ही करीबी क्यों ना हो, कितना ही अपना क्यों ना हो, उसे हम चाहते हैं जितनी तीव्रता से हो सके, श्मशान ले जायें। हमारा प्रयोजन ये नहीं है कि उसे जल्द जल्द से मुक्ति मिले, उसकी आत्मा समय-बद्ध नहीं है। हमारी भी आत्मा समय-बद्ध नहीं है, हमारा मन हमारे लिए उचित अनुचित निर्मित करता है। जब तक मनुष्य जीता है, वह अपना पूरा ज़ोर, अपने प्राण लगा देता है की रूपान्तरण ना हो, परंतु जैसे ही आत्मा अपने बंधन त्याग देती है और रूपांतरण घटित होता है, हम उसे जल्दी से जल्दी श्मशान ले जाना चाहते हैं। कभी कभी तो पहले से ही व्यवस्थाएं स्थापित कर देते हैं, क्या यह प्रेमवश है?
हम हमेशा से श्राद्ध निकालते आए हैं, श्राद्ध का महात्म्य आत्मा की तृप्ति के लिए है। श्राद्ध का अर्थ है, श्रद्धापूर्वक किसी वस्तु को अर्पित करना। श्राद्ध का उल्लेख हमारी सभ्यता में अनेकों जगह मिलता है। महाभारत में भी भीष्म युधिष्ठिर को समझाते नज़र आते हैं। यदि हम इन्हें मूलतः कथा कहानी ही मानें तो हम प्रतीकात्मकता को समझ सकते हैं। जो आवश्यक है, भारत का ध्यान उसी पर रहा, आत्मा पर रहा क्योंकि प्रेम आत्मिक है।