आदि शंकराचार्य और नागार्जुन
श्लोकार्घेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः। ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।
श्लोकार्घेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः।
ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।
नागार्जुन
बीते कुछ समय से, द्वैतववाद-अद्वैतवाद पे अ���्ययन करने के बाद कुछ नए आयाम नए सूत्र सामने आए। आदि शंकराचार्य रचयित ब्रह्मसूत्र एक विस्तृत और अचूक ग्रंथ है। आदि शंकराचार्य के लेख, उपनिषदों पर उनकी टिप्पणियाँ वैज्ञानिक स्तर पर बहुतेरे लेखकों और योगाचार्यों की नींव साबित हुई है। शंकर के संबंध में सबसे पहला प्रश्न उनके जन्म का है, उनके जन्म स्थान पर बहस नहीं है अपितु उनके जन्म काल के विषय हमारे पास अलग विद्वानों के अलग मत हैं। लगभग शत वर्षों के भेद में ये मत चलता आया है। प्रचलित मत के अनुसार शंकर का जीवन काल 700 ई. से 750 ई. ही रहा। आधुनिक इतिहासकारों का कहना है कि आदि शंकराचार्य का जन्म 788 ई. में कालडी (केरल) में हुआ था और उनका निधन 820 ई. में केदारनाथ (उत्तराखंड) में हुआ था, जबकि भारतीय परंपरा जो शंकर-विजय से ली गई है एक बहुत ही प्राचीन कालक्रम को मानती है
• श्री चित्सुखाचार्य (आदि शंकराचार्य के प्रत्यक्ष शिष्यों और सह-शिष्यों में से एक) की शंकर-विजय, जिसे बृहत शंकर-विजय के नाम से जाना जाता है।
• आनंदगिरि की शंकर-विजय (आदि शंकराचार्य और सुरेश्वर के भाष्यों और वार्तिकों के सुप्रसिद्ध टीकाकार), जिन्हें प्राचीन शंकर-विजय के नाम से जाना जाता है।
• विद्याशंकर या शंकरानंद (आत्म पुराण और उपनिषद, भगवदगीता और ब्रह्मसूत्र पर दीपिकाओं के लेखक) की शंकर-विजय, जिसे व्यासचलिया के नाम से जाना जाता है।
• गोविंदनाथ (केरल के पंडितों में से एक) की शंकर-विजय, जिसे आचार्य-चरित या केरलीय शंकर-विजय के नाम से जाना जाता है।
• चूड़ामणि दीक्षित की शंकर-विजय (कई संस्कृत कविताओं के लेखक और नाटककार), शंकरभ्युदय के नाम से जानी जाती हैं।
• अनंत-आनंदगिरि की शंकर-विजय, गुरु विजय या आचार्य-विजय के नाम से जानी जाती हैं।
• वलिसाहायकवि (श्रृंगेरी मठ के अनुयायियों में से एक) की शंकर-विजय, आचार्य दिग्विजय के नाम से जानी जाती है।
• सदानंद (श्रृंगेरी मठ के अनुयायी) की शंकर-विजय, शंकर दिग्विजय सार के नाम से जानी जाती है।
• चिदविलास (श्रृंगेरी मठ के अनुयायी) की शंकर-विजय, शंकर विजय विलासा के नाम से जानी जाती है।
• माधव विद्यारण्य (श्रृंगेरी मठ के अनुयायी) की शंकर-विजय, संक्षेपा शंकर विजय के नाम से जानी जाती है।
ऊपर शंकर-विजय दरशातें हैं कि आदि शंकराचार्य ऐसे समय में रहते थे जब बौद्ध धर्म, जैन धर्म और वैदिक दर्शन के छह प्रतिस्पर्धी दर्शन भारत में वर्चस्व के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे।
· गौतम का न्याय दर्शन
· कणाद का वैशेषिक दर्शन
· कपिल का सांख्य दर्शन
· पतंजलि का योग दर्शन
· जैमिनी का मीमांसा दर्शन, तथा
· बादरायण का वेदांत दर्शन
शंकर
पाणिनी, पतंजलि, कात्यायन, जैमिनी, बदरायण, शंकर, इन सभी विद्वानों के कालक्रम, लेख और पुस्तकों से एक निष्कर्ष तक पहुंचना अनुकूल है। शंकर को पढ़ते समय मुझे एक और दार्शनिक का विचार आया, नागार्जुन का, नागार्जुन और शंकर के सिद्धांत भले ही तथाकथित तौर पर भिन्न हैं, परंतु दोनों के लेखों और विचारों में कुछ समानताएं हैं। यही समानताएं हैं जिनके बूते पर हमें कहीं कहीं सुनने पढ़ने को मिलता है कि शंकर ने नागार्जुन के विचार चुराए। नागार्जुन के जन्म के विषय में भी विद्वानों का मतभेद है, विद्वान 200 वर्षों का कालक्रम लेते हैं। नागार्जुन आयुर्वेद, ज्योतिष विद्या, भारतीय रसायन शस्त्र और तंत्र के अद्भुत ज्ञात थे। भारतीय रसायन शस्त्र में नागार्जुन का नाम विराट है, उनके रासायनिक अनुभव बहुत प्रसिद्ध हैं, उन्होंने रसायन विज्ञान और चिकित्सा पर 'रसरत्नाकर' और 'आरोग्यमंजरी' जैसी पुस्तकें लिखीं हैं। नागार्जुन के अधिकतर लेख पाली और संस्कृत में भी हैं, संस्कृत और तंत्र पर वैज्ञानिक दृष्टि से नागार्जुन ने प्रयोग किए। बुद्ध दर्शन के अध्ययन के बाद नागार्जुन ने कहा की बुद्ध ने सिर्फ़ दो आदेश दिए। नागार्जुन ने अपनी किताब ‘माध्यमिक कारिका या माध्यमिक सूत्र’ में बोद्ध धर्म की नींव को समेट दिया और उनकी व्याख्या की। नागार्जुन की कृतियों का अध्ययन वेदांतियों ने भी किया। माध्यमिक सूत्र की वजह से ही शंकर पर आरोप है कि उन्होंने बहुतेरी चीज़ें माध्यमिक कारिका से चुराई हैं।
आदि शंकराचार्य और नागार्जुन दोनों ही विद्वानों का जितना संक्षिप्त परिचय हो पाया वो यहाँ है। नागार्जुन का शून्यवाद का सिद्धांत और आदि शंकराचार्य का अद्वैत वेदान्त दोनों का अध्ययन करना बड़ा अर्थपूर्ण है।