मीलपत्थर
ना हर्फ़ है ना पयाम, पर आस बहुत है

लोग जो कहते हैं कि “ये बात पत्थर की लकीर है” अमूमन वो मुझे दिलचस्प नज़र आते हैं। आजकल मेरी कही अनकही बातें पत्थर की लकीर होने लगीं हैं। बातों को पत्थर की लकीर बनाना सुनने में बड़ा साधारण मालूम होता है, पर साधारण है नहीं। मनुष्य जीवन में सदियों का काम कुछ बरसों में हो जाता है, जैसे मनुष्य का पत्थर हो जाना। मनुष्य के पत्थर हो जाने के बाद ही उसकी बातें पत्थर की लकीर होने लगती हैं, इस सिद्धि की यही शर्त है। पत्थर पृथ्वी के गर्भ में बनते हैं, पत्थर को पत्थर होने के लिए अपनी ऊष्मा त्यागनी पड़ती है। अपनी प्रवृत्ति का त्याग कर भूगर्भ से निकल कर कठोर, शीतल, बेजोड़ होना पड़ता है। पत्थर हुए लोगों में बहुत संवेदना देख पाता हूँ मैं, वो संसार को ऐसी दृष्टि दे पाते हैं जो वो चाहते थे उन पर पड़े। जब तक उन्हें आभास भी हुआ की ये दृष्टि अपने लिए भी हो सकती है, तब तक आईने दोबारा रेत बन गए और रेतघड़ी में भर दिए गए। ये घड़ी अब दुनिया का समय बताने लगी। जो लोग पत्थर हुए उन्हें मैंने प्रेम को याद करते देखा है, उनका दिल होता है कि अपने भाई की ज़िम्मेदारियाँ कम करें, ये लोग बाप का ख़ाली कमरा देख कर डर जाते हैं। अहिल्या मूरत थोड़ी हो गईं थीं, वो पत्थर हुईं थीं। बड़ा फ़र्क़ है मूरत और पत्थर में, आजकल लोग चाहते हैं वो कहे और पत्थर की लकीर हो जाये। लोग बहुत कुछ चाहने लगे हैं आजकल। जिन पत्थरों ने ख़ुद को बुनियाद बनाया की भविष्य सदृढ़ खड़ा रहे, वो आगे चल कर मील के पत्थर हो गए। खैर कुछ बरसों में इन पर भी रेत की नई परत आ जाएगी या मनुष्य किसी क्रांति से इन्हें उखाड़ फेंकेगा। मीलपत्थरों को मैं मजाज़ी तौर पर बस पेड़ों के नीचे छाँह में देख पाता हूँ, धूप छाँह के खेल में वही उनकी सही जगह मालूम होती है। बहुत लुत्फ आता है जब किसी मीलपत्थर से टेक लगा कर हम हवा, घास, मिट्टी, धूप, बारिश के लम्स को पाते हैं।