#37

वगैरा-वगैरा

वमन ना हो

यौवन··हिन्दी

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वो लोग जो एक अरसे पहले रोए थे वो कैसे दिखते हैं? कैसे दिखते हैं उनके आँसू? कैसी है उनकी आँखें? मुझे लगता है आजकल मेरी आँखों की रौशनी जाने लगी है। हाँ, उनकी आँखों की भी रौशनी चली जाती है। शायद ऐसे ही लोग पत्थर हो जाते हैं। बुनियादों का पत्थर पर टिका होना अहम है। एक ख्वाब आजकल मेरी बुनियाद बन गया है, आँखें जोर से बंद करने पर एक दूर दराज़ नजारा दीखता है जिसमे बहुत सारे बादल, कुछ पहाड़, काफी सारा पानी और मैं। इसके अलावा भी जरूर कुछ होगा ख्वाब में। ख्वाबों की दुनिया यूं बेबुनियाद थोड़ी होती है। जैसे इस दुनिया को ही ले लो, भगवान का सपना है, सब कुछ है इस सपने में जाना पहचाना, भोला भाला। परंतु भगवान स्वप्न का निर्माण कैसे करते हैं? इसका जवाब शिव ने विज्ञान भैरव तंत्र में विधियों द्वारा दिया है। शिव ने त्रिनेत्र की भूमिका बताई है, जो हमारे माथे के बीच सधा हुआ है। शिव ने उसके कुछ प्रयोग दिए हैं, शिव कहते हैं त्रिनेत्र की प्रकृति, प्रवृत्ति ऐसी है की उसके लिए कल्पना और वास्तविकता दोनों अलग नहीं हैं। कल्पना ही तथ्य है, जैसी कल्पना होगी वैसा हो जाएगा। स्वप्न और यथार्थ में फासला नहीं है। स्वप्न देखने पर ही वह सच हो जाएगा। यही कारण है की संसार को परात्मा का स्वप्न कहते हैं-यह परमात्मा की माया है। मैंने लोगों को कहते सुन है “तुम्हारी माया तुम जानो” ये बात अब अति बोधपूर्वक मालूम होने लगी है।

वगैरा-वगैरा · Youvan Prakashan