चित्र
कहीं बीच में उसकी खिड़की थी आशिकों का हुजूम उमड़ता था
यौवन··हिन्दी

लगभग तीन बरस पहले एक कविता हुई, हर कविता की तरह ये कविता भी अपने आप उतरती गई और एक चित्र निर्मित हो गया। अनेकों कविताओं के क्रम में एक और -
एक गली में जाना था
एक कूँचा बीच में पड़ता था
पहचान रही है अब तक ये
वहां रोज़ एक पागल लड़ता था
लोगों ने इसे तंग किया
एक मौसम पानी भरता था
सैकड़ों लोग थे मंडी में
ख़रीदार दुकां पे अकड़ता था
कहीं बीच में उसकी खिड़की थी
आशिकों का हुजूम उमड़ता था
रंग बिरंगी पोषकें थीं
आदम पे आदम चढ़ता था
भीड़ ना जाने किसके दर थी
हर आशिक आगे बढ़ता था
गाय फिरे थीं गंद को खाती
उसे माँ माँ सुनना पड़ता था
घी कि रोटी, मीठे लड्डू
कुत्ता भी अचम्भा करता था
और मिठाई वाला बंधु
मच्छर, करछी से लड़ता था
आला टाँके देख सडक पे
हकीम भी पेट पकड़ता था
सियासी मसले बांटे जाते
कोई पहले अखबार जकड़ता था
नेहरू, जिन्ना, गाँधी, मोदी
कोई राहुल कि खातिर लड़ता था
दूर से जाती एक मोहतरमा
सुबह सब का ईमान फिसलता था
खोया खोया दीखता यौवन
मुरशद कोई हाथ पकड़ता था
तालीम के ठेकेदारों से
वाइज़ का मज़हब लड़ता था
एक नमूना सबको मिलता
अदब के पर्चे भरता था
बातों के शौकीन बुज़ुर्ग
उनमें एक इलमी लड़का था
फैज़ कि नज़्म का नाम वो ले
अपने ही रिसाले पढ़ता था