शिव से शिव
तुम्हें अगर है आन कुछ, मनुष्यता के नाम की तो ध्यान ये बना रहे, वमन ना हो वमन ना हो
कवि शिवमंगल सिंह सुमन
कवि शिवमंगल सिंह सुमन ने कहा था
“तुम्हें अगर है आन कुछ,
मनुष्यता के नाम की
तो ध्यान ये बना रहे,
वमन ना हो वमन ना हो”
शिव ने ये शिव के लिए लिखा था, शिव को शायद अनुभूति थी मनुष्य जीवन के मंथन के बाद निकले हुए गरल को पी जाना आसान नहीं है। आज यह अत्यंत कठिन मालूम होता है, अनेकों लोग हैं अनेकों जीवन हैं और अनेकों मंथन हैं जिनसे कभी अमृत हमारे हिस्से में आता है और कभी गरल। गरल को अनैतिकता से ना तोला जाए तो ठीक है, अनैतिक कार्य उसके निष्कर्ष, उसके फलस्वरूप हमें प्राप्त होती है, कोई कृत्य जन्म से अनैतिक नहीं होता। अनैतिक से जन्मा अनैतिक जरूर समझते हैं पर बहुत गहरे में ये भी वास्तुतः अलग है। आज कल दो ही विषय हैं जिनके संबंध में मुझे विचार आते हैं। मेरे प्रश्न नहीं हैं विचार हैं। समर्पण और अहंकार, ये एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। भैरव तंत्र कहता है की अहंकार का सृजन, अहंकार का जन्म द्वन्द्व से होता है, यह बहुत सरल बात है, जितना हम लड़ेंगे उतना ही अहंकार पैदा होगा। अहंकार के सृजन के लिए संघर्ष वह पद्दती, वह प्रक्रिया है। जितना द्वन्द्व पैदा होगा, अहंकार उतना ही प्रबल होगा, और यदि संघर्ष के बाद हम विजयी हुए तो अहंकार परम हो जाएगा। यहाँ मुझे 2 विचार आते हैं, एक योग के समर्थन में और तंत्र के समर्थन में। मेरी समझ है की योग की प्रक्रिया से निरहंकार को प्राप्त होना अत्यंत कठिन है, असंभव ही मालूम होता है, क्योंकि योग का मार्ग दमन का है, संघर्ष का है। यहीं तंत्र का कहना है की संघर्ष है ही नहीं, और हम निरहंकार हैं, अहंकार की संभावना ही नहीं है।
“मगर अभी तो पग प्रथम,
कहाँ समाप्त साधना”
योग हो या तंत्र, दोनों ही मार्ग बहुत अलग हैं और बहुत लंबे भी, अहंकार को जान लेना, अहंकार में पूर्णतः उतर जाना दोनों का ही प्रथम पग है। अहंकार में बिना उतरे ये यात्रा आरंभ नहीं हो सकती, पूर्ण होने की संभावना तो पैदा ही नहीं होती।
कविता
तुम पी रहे गरल की देख नीलकंठ मुग्ध हैं
सुधा लजा गई अमर पतित असुर विक्षुब्ध हैं
मगर अभी तो पग प्रथम कहाँ समाप्त साधना
है नरत्व ताव पर, लगा हुआ है ग्राम ग्रह नगर सभी तो दांव पर
तुम्हें अगर है आन कुछ मनुष्यता के नाम की
तो ध्यान ये बना रहे वमन ना हो वमन ना हो
तुम तप रहे हो जिस तरह न तप सका निदाघ भी
तुम्हारी आग देख मंद पद गई दवाग भी
मगर अभी तो पग प्रथम कहाँ समाप्त साधना
लपट लपट से भेंट लो हर एक शोला चिंग चिंग अंक में समेट लो
बने अगर विभूति तो जो आ रहीं है पीढ़ियाँ
भविष्य में उन्हें कभी तपन ना हो तपन ना हो
- कवि शिवमंगल सिंह सुमन