एक लेख पढ़ने का सुझाव
अव्वल कौन?

दुनिया के अव्वल अफ़सानानिगार कहानीकार जाँनिसार इतनी जल्दी नहीं बदलते जितनी जल्दी उनकी फ़ेहरिस्त में खड़े अनगिनत लोग बदल जाते हैं। मुझे अपनी २२ वी सालगिरह पर आज ये सुकून है कि मैं उस बदलती फ़ेहरिस्त में कहीं नहीं हूँ। अव्वल अफ़सानानिगार नहीं क्योंकि आज तक महज़ एक ही अफ़साना लिखा है, अव्वल कहानीकार नहीं क्योंकि अफ़साना ही कहानी होती है, ना अव्वल जाँनिसार, क्योंकि अभी जाँ है। ये सब ऊँचे और अच्छे ख़याल इसलिए हैं क्योंकि ये सब क़ाबिल लोगों के काम है। मैं हूँ उन क़ाबिल लोगों को देखने वाला। कर्ता नहीं हूँ, कर्म से तो बड़ा दूर बैठा हूँ। जितनी गतिमान आज कल गतिविधियाँ हो गईं हैं, ऐसे में कुछ करने की इच्छा भी बहुत कम होती है, इसलिए बेहतर लगता है ख़ुद को कर्ता की फ़ेहरिस्त से दूर रखूँ। सिकंदर ने अपने आख़िरी समय में प्रभु को और उनकी संरचना को कोसा, उसने कहा यदि जीतने को दो दुनिया बनायीं होती तो बड़ा अच्छा होता। यही ख़याल शायद नेपोलियन का भी होता। पर जो मैंने बीते हज़ारों वर्ष देखे हैं, मुझे लगता है उनमें प्रगति और प्रयास का कारण साधन नहीं अपितु तैयारी था। ख़ैर पहले भी सभी कहाँ तैयारी करते थे, जो आज भी तैयारी कर रहे हैं उनको आशीर्वाद। जिनको आकांक्षाएं हैं उनको बधाई, आकांक्षाएं पूर्ण हो जाती हैं, जो प्रयास कर रहे हैं उन्हें सुझाव कि बिना प्रार्थना प्रयास ना कीजिए। और जो मेरी तरह हैं, जो मैं ही हूँ, दिन भर आराम और ध्यान के बीच में सब कुछ समेटने वाले, आँखें खुलीं रखना कुछ नज़र से चला जाएगा। ये सब पढ़ कर यदि दिल हो कि कुछ सूझा, बँधा पिरोया हुआ पढ़ना है तो परसाई जी का लेख ‘डिवाइन लूनटिक मिशन’ पढ़ लीजिएगा, आनंद आयेगा।
आपका आगामी प्रत्येक क्षण आनंदमयी हो।