वगैरा-वगैरा
इनमे नहीं आती, तो क्यों रौशनी इन तलक आती है
यौवन··हिन्दी

बीते बरस खतों का सिलसिला कुछ यूं ही चलता रहा, नए खयाल आते गए, नए लेख उतरते गए, किसी ने इन्हे आज़ाद नज़्म कहा तो किसी के लिए ये सिर्फ किस्सागोई थी। ऐसे ही छोटा-मोटा, लिखते-लिखाते, कहानीकार-अफ़सानानिगार बनने का भरसक तो नहीं पर कुछ-कुछ प्रयास वाकई किया। वो प्रयास सफ़ल भी हुआ। उस सफ़ल प्रयास की कथा किसी और दिन। आज के लिए एक कृति नीचे-
किसी गैर के लफ्जों में अपनी ही झलक आती है
हर शाम रौशनी भी छोड़ फ़लक जाती है
मैं दीवारों को देखता हूं और सोचता हूं
इनमे नहीं आती, तो क्यों रौशनी इन तलक आती है
मेरे पास किताबें हैं और मैं जानता हूं
मेरी दुनिया अजीब है, यहां किताबें मर जाती हैं
मेरे दरीचे के खांचे में गुम ये किताबें
जब मौसम से गवारा हो कर
अल्फ़ाज़ से परे कुछ समा जाती हैं
तो कट चुके दरख्तों की रूह
हवाओं के सहारे उनमें आ जाती है
फ़ौत हो चुकी किताबों से यूं घुटन होती है
कि मानो अपने किसी के जाने का ग़म हो
उनमें वो नमी होती है
जिसके आगे समंदर का पानी कम हो
मर चुकी किताबें चीखती हैं
जिंदगी के अमल से हम हैं
मर चुकी किताबें दिखाती हैं
की ये ही तो अजल से हम हैं
मर चुकी किताबें मेरी सांसें लेती हैं
मानो उनकी सांसें कम हैं
मेरे कमरे में किताबें देखो
देखो कमरे में जहन्नम है
जितना लिखा जा चुका है वो हौले-हौले जगज़ाहिर हो रहा है, बड़ा समय लगेगा अभी, बड़ा सारा लिखा हुआ है।