#30

साठ दिन

साठ दिन की मोहलत मिली थी।

यौवन··हिन्दी

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अब से अमूमन डेढ़ बरस पहले एक रात ये लिखा गया, जहन्नुम से खतों की ही कड़ी में एक लेख ये भी है। अभी बीते कुछ समय से कोई कहानी, कविता या ग़जल हुई नहीं है, इसके और कारण हैं जो विस्तार मांगते हैं। परंतु अभी के लिए इतना ही।

साठ दिन थे हमारे पास, 
बस साठ दिन की मोहलत मिली थी। 
तुम्हे देखते ही मैं तुम्हारा था, 
तुम्हारी शक्ल में मुझे मोहब्बत मिली थी। 
तुम्हारे बारे मैं सोचते थकता नहीं था, 
तुम्हारी ही बातें मुझे याद आती थी। 
कुछ दिनों के लिए मेरा तक़द्दुम बदला, 
ये दुनिया तुम्हारे बाद आती थी। 

उस रोज़ मैने बहुत कुछ कहा था, 
उस रोज़ किए वादे खरे थे। 
मेरी खातिर वो साठ दिन और थे, 
मेरे ज़िंदगी के हजारों उनसे परे थे। 
मैं बेहद खुश था तुम्हारे साथ, 
मैं बेबाक था। 
वक्त मुझे परखता था, 
वो भी बहुत चालाक था। 
उन साठ दिनों में मुझे तुमने बेशुमार दिया। 
मैं जैसा भी था तुम्हारा था, 
तुमने मुझे प्यार दिया। 
साठ दिन के बाद समझ आया, 
समझौता ही कभी कबार इश्क है। 
किसी की खातिर 
सब कुछ लुटाने वाले का ज़ार इश्क है। 
काश साठ दिन के पार कुछ होता, 
मेरे भीतर ये खलिश थी। 
मुझे हश्र तक जाना था तुम्हारे साथ, 
मगर साठ दिन की ये बंदिश थी। 
तुम्हारे होने ने यकीन दिलाया 
की मुझे मोहब्बत बस एक से है। 
ये साठ दिन 
ख्वाहिशों के आगे दो–एक से हैं। 
वो साठ दिन मेरी जिंदगी में मोहब्बत के दिन हैं, 
सदियों खातिर मिली उम्मीदें इनके आगे अनगिन हैं। 
मैं मुतमइन था इश्क में चोट आखिरी लग रही थी। 
मुझे हकीकत में लौटना था, 
मेरी हाज़िरी लग रही थी। 
मैं खोया हुआ था रफ़्तगाँ में नहीं था। 
मेरा हमशक्ल था जहन्नम में, 
मैं वहां नहीं था।
साठ दिन · Youvan Prakashan