परसाई के शब्द
हनुमान सुग्रीव के यहाँ स्पेशल ब्रांच में थे
Hanuman Ji In Mysore Tanjore By Dr. J Dundaraja
हरिशंकर परसाई को पढ़ने की सबसे पहले इच्छा मुझे मेरे एक मित्र के सुझाव पर हुई। मित्र ने महज़ इतना कहा की कभी गौर करना कि परसाई जी की चंद तस्वीरें हीं हैं जो उपलब्ध हैं। मैंने कुछ तस्वीरें ढूँढने की कोशिश की पर विफल रहा। परसाई जी के बारे में पढ़ते समय एक बात बारम्बार मेरे सामने आई कि परसाई जी व्यंग्य लिखते हैं। परसाई जी से पहले मैं इंशा जी को पढ़ चुका था, और इंशा जी मुझे बड़े अज़ीज़ हैं। इंशा जी भी व्यंग्य लिखते थे, उन्हे विश्व के अव्वल ‘ह्यूमरिस्टस’ में दर्जा दिया जाता है, खैर मैं तो यही मानता हूँ। परसाई जी का पहला लेख मैंने पढ़ा वो था ‘तट की खोज’। तट की खोज पढ़ने के बाद मैं विस्मय में था कि एक तथाकथित व्यंग्य लेखक इतना सरल उपन्यास लिख सकता है जिसमे व्यंग्य की कहीं, झलक भी ना हो।
कुछ दिनों पहले मैंने परसाई जी की एक कहानी पढ़ी, जिसका उनवान है ‘इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर’। उस कहानी में हनुमान जी का जिक्र पढ़ कर मुझे आनंद आया सो आपके लिए कहानी की एक छोटी सी झलक-
“एक दिन आराम करने के बाद मातादीन ने काम शुरू कर दिया। पहले उन्होंने पुलिस लाइन का मुलाहज़ा किया।
शाम को उन्होंने आई.जी. से कहा—आपके यहाँ पुलिस लाइन में हनुमानजी का मंदिर नहीं है। हमारे रामराज में पुलिस लाइन में हनुमानजी हैं।
आई.जी. ने कहा—हनुमान कौन थे—हम नहीं जानते।
मातादीन ने कहा—हनुमान का दर्शन हर कर्तव्यपरायण पुलिसवाले के लिए ज़रूरी है। हनुमान सुग्रीव के यहाँ स्पेशल ब्रांच में थे। उन्होंने सीता माता का पता लगाया था। ’एबडक्शन’ का मामला था—दफ़ा 362। हनुमानजी ने रावण को सज़ा वहीं दे दी। उसकी प्रॉपर्टी में आग लगा दी। पुलिस को यह अधिकार होना चाहिए कि अपराधी को पकड़ा और वहीं सज़ा दे दी। अदालत में जाने का झंझट नहीं। मगर यह सिस्टम अभी हमारे रामराज में भी चालू नहीं हुआ है। हनुमानजी के काम से भगवान राम बहुत ख़ुश हुए। वे उन्हें अयोध्या ले आए और ‘टौन ड्यूटी’ में तैनात कर दिया। वही हनुमान हमारे अराध्य देव हैं। मैं उनकी फ़ोटो लेता आया हूँ।
उस पर से मूर्तियाँ बनवाइए और हर पुलिस लाइन में स्थापित करवाइए।”
परसाई जी ऐसे ही अन्य लेख लिखें हैं जिसमे आध्यात्म, साहित्य जैसे अनेको पहलू अछूते नहीं हैं। परसाई जी का एक और उपन्यास, ‘रानी नागफनी की कहानी’ जीवन और साहित्य के दृष्टिकोण से तो अद्भुत है ही, परंतु दार्शनिकों को भी इसमे बड़ा मज़ा आएगा। हिन्दी के हर पाठक को मेरा सुझाव है की परसाई जी को जरूर पढ़ा जाए। महज़ हास्य के लिए नहीं परंतु उनके लिखे अनेकों रसों के लिए।
परसाई जी समय-समय पर ऐसे विषयों के बारे में लिखते रहे हैं जो हमारे काल में घटित तो हो रहे हैं परंतु उस नज़रिये से किसी ने उन्हे लिखा नहीं है। परसाई जी के कुछ लेख हैं जिन को ले कर साहित्य प्रेमियों में मतभेद हैं परंतु वे लेख भी अति रोचक हैं। जैसे परसाई जी का ओशो के लिए लेख, अब उस पर स्वयं ओशो की भी टिप्पणी है। मेरा सुझाव है की अवसर मिलने पर परसाई जी को पढ़ा और सुना जाए, और ये पढ़ना सुनना बस नाम ही के लिए ना हो।
प्रणाम!