#28

जहन्नम से

मैं हर रोज़ तुम्हारे हिस्से क�� ख़त खुद को लिख रहा हूं

यौवन··हिन्दी

एक बरस पहले इन्हीं दिनों हाल कुछ अलग था, हताशा, निराशा, तैश सब कुछ था पर उसके साथ अनुशासन भी था। उसी अनुशासन के चलते एक सप्ताह तक रोज़ नए खयाल लिखे गए। मैंने इन्हे लिख कर एक ओर रख दिया था, मुझे लगता था की बड़ी बचकानी हरकत है ऐसे भाव व्यक्त करना। पर अब सुबह किसी बहाने से ये मेरे सामने आए तो साझा करने का खयाल आ गया। जहन्नम के खत आपके लिए...

मैं हर रोज़ तुम्हारे हिस्से के ख़त खुद को लिख रहा हूं, 
मैं लिख रहा हूं खुद ही तुम्हारे बारे में। 
तुम मुझसे दूर तो पहले भी रही हो, 
मैं पहले भी सोचता था तुम्हारे बारे में। 
सर्द ��ील के किनारे मैं रहता हूं, इंतज़ार है, 
ठहराव है इसके इशारे में। 

खाख़ हो चुके दरख़्तों का मैं माज़ी हूं, 
मुझे ख़बर है जलने पर इनकी अना कहां गई। 
हर मौसम में सीधे तने रहते थे, 
कौन से मौसम की हवा इन्हे खा गई। 

तुम्हारा तस्सवुर था जिससे हवा के बदन में आग थी। 
तुम्हारा नूर झील सा था, 
तुम्हारे जाने पर तो मेरे वतन तक में आग थी। 
मेरा कोई ख्वाब ही था, 
की तुम मुझे भी याद करती हो। 
मेरा भरम आज भी पुरज़ोर है, 
तुम मुझे आज भी आबाद करती हो। 
वो और दौर था की मैं रास्ते बनाता था पर गुमराह था, 
एक दौर याद है मुझे की मेरा भी कोई हमराह था। 

मैं तुम्हारे खतों में खुद को लिखता हूं, 
की तुम्हे मुझसे प्यार है। 
तुम्हारी बातें मानता था मैं, 
तुम्हारे कहने पर मुझे ऐतबार है। 
तुम मुझमें बेहद हो, 
तुम ही तक मेरी हदें कसम से हैं। 
तुम्हारी तरफ़ से मुझे कोई ख़त नही, 
मेरे ही ख़त मुझ को जहन्नम से हैं।
जहन्नम से · Youvan Prakashan