फ्रेडरिक निट्शे
फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं डोर को सुलझा रहा है और सिरा मिलता नहीं - अकबर इलाहाबादी
Philosopher's Lamp by René Magritte
जर्मनी में फ्रेडरिक निट्शे (Friedrich Nietzsche) नाम का एक असाधारण विद्वान् हो गया है। उसे मरे अभी 124 वर्ष हुए । तब से उसके चरित तथा शिक्षाओं से सम्बन्ध रखने वाली पुस्तकों की संख्या सभी देशों में दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। उसकी शिक्षाओं का लोगों पर, विशेष कर उसके देश- वासियों पर, जो असर पड़ा है उसके सम्बन्ध में विद्वानों में बहुत मत-भेद है। कोई कोई उसे जर्मनी का सबसे बड़ा तत्त्ववेत्ता और नीतिशास्त्री मानते हैं, पर कोई कोई उसे अज्ञानी, मूर्ख, दुराचार-शिक्षक और अव्यवस्थितचित्त बताते हैं। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि जर्मनी में युद्ध से प्रेम और शान्ति से घृण पैदा कराने वालों में ट्राइट्स्के नाम के लेखक के बाद इसी का नम्बर है। यही कारण है कि जब से यूरोप में महाभारत मचा है तब से इसके विषय में सैकड़ों लेख लिखे जा रहे हैं। इसके विचार-वैचित्र्य की लोगों में यत्र तत्र चर्चा भी खूब होने लगी है।
फ़्रेडरिक निट्शे का जन्म, सन् 1844 ईसवी में, एक ईसाई पादरी के घर हुआ था। जब वह 6 वर्ष का था, उसके पिता की मृत्यु हो गई। तब से वह बराबर अपनी माता की देखरेख में एक ग्रामीण स्कूल में शिक्षा पाने लगा । वहाँ की पढ़ाई समाप्त करके वह, 1864 में, जर्मनी के बान-विश्व-विद्यालय में जा कर भरती हुआ। वहाँ से, कुछ काल बाद, वह लिपज़िक नगर को चला गया। लिपज़िक में वह शोपनहार नामक तत्त्वज्ञानी की शिक्षाओं पर मुग्ध हो गया। शोपनहार अलौकिक प्रतिभासम्पन्न दार्शनिक था। वह हमारे उपनिषद्-ग्रन्थों को बड़े ही आदर की दृष्टि से देखता था। निट्शे ने एक जंगह लिखा है- "मैं उन लोगों में से हूँ जो शोपनहार की किसी पुस्तक का एक पृष्ठ पढ़ कर उसे बिना समाप्त किये नहीं रह सकते और जो उस महात्मा के मुख से निकलने वाले प्रत्येक शब्द को बड़े ध्यान से सुनने के लिए लालायित रहते हैं। ज्यों ज्यों समय बीतता है, मेरा विश्वास उसके वचनों पर बढ़ता ही जाता है। ऐसे ज्ञानी संसार में शायद ही कहीं खोजने से मिलेंगे"। यह बहुत कुछ शोपनहार की ही शिक्षाओं का फल था कि निट्शे ईसाई धर्म का परित्याग करके सदा के लिए कट्टर नास्तिक बन गया । शोपनहार के ही दुःखमय जीवन को लक्ष्य करके उसने लिखा है - "संसार में सुखमय जीवन असम्भव है। मनुष्य-जन्म लेकर कभी अच्छे या बुरे फल के मिलने की परवाह न करके - प्रत्येक कार्यक्षेत्र में वीरत्व दिखाना ही सब से अधिक प्रशंसनीय काम है। ऐसे मनुष्य का हृदय अन्त में वज्रवत् कठोर हो जाता है, पर उसकी महत्ता में रत्ती भर भी कमी नहीं होती। उसकी कामनायें नष्ट सी हो जाती हैं। वह कर्त्तव्यपरीक्षाओं में अवश्य ही उत्तीर्ण होता है। संसार की कृतघ्नता का अनुभव करता हुआ वह अन्त में निर्वाण प्राप्त करता है। संसार में उसकी स्मृति रह जाती है। और लोग उसे वीर कह कर उसकी पूजा करते हैं"।
थोड़े ही समय बाद निट्शे बेल-विश्वविद्यालय में ग्रीक-भाषा-शास्त्र का अध्यापक नियत हो गया। लिपज़िक के विश्वविद्यालय ने बिना उसकी परीक्षा लिये ही, उसे 'डिगरी' दे दी। बेल में पूरे दस वर्ष वह अध्यापन का कार्य करता रहा। जब1870 में जर्मनी और फ्रान्स के बीच युद्ध छिड़ा, निट्शे रोगियों की सेवा-शुश्रूषा करने के लिए जर्मन सेना के साथ फ़्रान्स गया। वहाँ से, कुछ काल बाद, बीमार होकर वह घर लौट आया। 1872 में उसने "वियोगान्त या दुःखान्त नाटकों की उत्पत्ति" The Birth of Tragedy नाम की अपनी सब से पहली पुस्तक प्रकाशित की।
निट्शे ईश्वर या परलेाक का अस्तित्व न मानता था। शोपनहार के सदृश उसका भी यही ख़याल था कि संसार में सुख की अपेक्षा दुःख अधिक है और हमारे दुःखों का एक मात्र कारण हमारी इच्छायें, हमारी भिन्न भिन्न प्रवृत्तियाँ, हैं। अतएव जहाँ तक हो सके हमें उनसे रहित होने का प्रयत्न करना चाहिए । पर शोपनहार का मत यह था कि संसार की यातनाओं से छुटकारा पाने का उपाय, संसार में जन्म-ग्रहण करने की इच्छा का नाश करना - निर्वाण पद की प्राप्ति के लिए प्रयास करना है। और, निट्शे के अनुसार इस उपाय का अवलम्बन करना मनुष्योचित व्यवहार नहीं। वह कहता है- "अगर दुनिया तकलीफों से भरी है तो भरी रहे । तुम्हें इस कारण जीवन से निराश होना उचित नहीं। अनन्त जीवन का जो स्रोत तुम्हारे चारों ओर प्रवाहित हो रहा है उसमें तुम्हारा जीवन एक तरंग के समान है। इस लिए संसार के दुःख को अपना दुःख समझना, अपने हृदय में सहानुभूति का भाव उत्पन्न करना तुम्हारा धर्म है; जीवन के बन्धन से मुक्त होने की कोशिश करना तुम्हारा धर्म नहीं। आदर्श पुरुष वही है जो जानता है कि संसार में सच्चा सुख कभी नहीं मिल सकता, जो हमारे और तुम्हारे लक्ष्य-पदार्थ- बाहरी चमक-दमक और शोभा-समृद्धि को घृणा की दृष्टि से देखता है, जो नाश करने योग्य पदाथों का नाश करने में कभी संकोच नहीं करता, जो स्वयं दुःख पाकर अथवा दूसरों को दुःख पहुँचा कर मुख से कभी 'आह' नहीं निकालता और जो अपनी जीवन-यात्रा मैं कभी सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होता"। हमें अपना स्वभाव कुछ ऐसा बना लेना चाहिए जिसकी बदौलत हमें संसार सदा आनन्द-परिपूर्ण दिखाई दे और हमें कभी निराशा से भेंट न हो।
निट्शे ने अपनी नव-प्रकाशित पुस्तकों में यही सिद्ध किया है कि इसी भारी जीवनसमस्या को हल करने के उद्देश से, पुराने समय में, यूनानी बिद्वानों ने वियोगान्त अथवा दुःखान्त नाटक लिखे थे। क्योंकि जब कभी कोई पुरुष ऐसा अभिनय देखता था तब उसकी अहन्ता नष्ट हो जाती थी और वह विश्व के प्रेम में डूब कर, प्रकृति के साथ एकीभूत हो जाता था। निट्शे वास्तव में प्राचीन यूनानी सभ्यता का बड़ा पक्षपाती था। वह आधुनिक सभ्यता को बड़ी ही तुच्छ दृष्टि से देखता था। उसका मत था कि प्राचीन यूनानियों ने कविता, संगीत, नाटकाभिनय, चित्रण, तक्षण इत्यादि कलाओं की सृष्टि इसी उद्देश से की थी कि जीवन के अन्धकारमय अंश पर ऐसा पर्दा गिर जाय जिससे हमें सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश दिखाई दे, और हम संसार की भयंकरता को सदा के लिए नहीं तो कुछ काल के लिए अवश्य ही भूल जायँ ।
1875 में निट्शे का स्वास्थ्य बहुन बिगड़ गया। इससे वह अध्यापन का कार्य छोड़ कर अपने मित्र-प्रसिद्ध सङ्गीताचार्य - वागनर से मिलने के लिए, 1876 में, बेलेउथ नामक नगर को चला गया। उसी साल उसने वागनर की कला-कुशलता के सम्बन्ध में एक पुस्तक भी प्रकाशित की। इसके पहले उसने शोपनहार की शिक्षाओं पर भी एक पुस्तक लिखी थी । पर इसी निट्शे ने, 1888 में, वागनर को साँप (A clever rattlesnake, a typical decadent) कह कर उसका परिचय दिया। शोपनहार में भी उसकी श्रद्धा अधिक काल तक नहीं रही। धीरे धीरे उसके विचारों में बड़े परिवर्तन उपस्थित होते गये।
"Naturally a hero-worshipper, he lost, in the isolating process of his thinking, all his early ideals, his works becoming more and more charged with strongly-worded denunciations of all modern men and things." I
1879 ईसवी में उसने विश्वविद्यालय की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके दो वर्ष बाद उसने प्रभातागम The Dawn नाम की एक पुस्तक प्रकाशित की। उसमे उसने दिखाया कि शरीर-शास्त्र के सिद्धान्तों के आधार पर ही सच्चा सामाजिक संगठन हो सकता है। 1882 में उसने – आनन्ददायक ज्ञान The Gay Science - नाम की पुस्तक लिखी। उसकी प्रसिद्ध पुस्तक-ज़रथुष्ट्र की वचनावली-भी इसी साल निकली। शक्ति की कामना-नाम की एक बहुत बड़ी पुस्तक लिखने की उसकी बड़ी इच्छा थी। पर उसे वह पूरी न कर सका। उसके लिए उसने जो 'नोट' इकट्ठे किये थे वे अब 800 पृष्ठों में, पुस्तकाकार, प्रकाशित हुए हैं। यह पुस्तक निट्शे के विचारों की विचित्रताओं की खान है।
निट्शे की समझ में यह कहना कि जीवधारियों के बीच अपना अपना अस्तित्व बनाए रखने के लि��� संघर्षण चल रहा है, भूल के सिवा और कुछ नहीं। अपनी शक्ति - अपनी प्रभुता बढ़ाना ही हम लोगों के जीवन का एकमात्र उद्देश है। निट्शे ने अपने पक्ष के समर्थन में जो प्रमाण पेश किये हैं वे इस छोटे से लेख में नहीं दिये जा सकते । समाज में सबके स्वत्व बराबर हैं, इस विचार का वह बड़ा ही विरोधी था। वह समाज में सब को बराबर अधिकार देना पसन्द न करता था। उसकी शिक्षा है कि समाज वर्णाश्रमधर्म पर ही ठहर सकता है; उसकी उन्नति के लिए समाज में भिन्न भिन्न जातियों का होना ज़रूरी है। वह समाज को हमारे मनुजी की व्यवस्थाओं के अनुसार सङ्गठित करना चाहता था। उसने ऊँची और नीची जातियों के जो भेद बताये हैं वे जानने योग्य हैं-
"नीची जातियों के हिस्से में दो ही चीजें हैं- अन्धविश्वास और दासत्व। इनके सिवा उनके लिए तीसरा मार्ग नहीं। दुःख उनके भाग्य में बड़ा है। इससे वे कभी बच नहीं सकतीं, क्योंकि 'सत्य' स्वयं कठोर है। इसी कारण किसी विशेष धर्म, सम्प्रदाय या पन्थ में अन्धविश्वास रखना उनके लिए बहुत आवश्यक है। ऐसे विश्वास की बदौलत उन्हें सन्तोष और शान्ति मिल सकेगी, और दूसरों के आज्ञा-पालन की उन्हें आदत पड़ जायगी। कृषि, व्यापार, कला-कौशल और विज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले सभी काम इन्हीं नीच जातियों को करने पड़ेंगे । इनके बाद, न्यायाधिकारियों और युद्ध विद्याविशारदों का स्थान रहेगा। सबसे ऊँचा दरजा उन महात्माओं का होगा जो अपने देश कालानुसार भले-बुरे का सच्चा ज्ञान रख सकेंगे और जो सर्वसाधारण लोगों के नेता बनने में अपने अथवा अपने समाज के सुख-दुख की कुछ भी परवा न करेंगे। वे संसार में जीवन और मरण के बाज़ी लगा कर अपना खेल खेलेंगे चौर अपनी वास्तविक उन्नति का सदा ख़याल रखेंगे" ।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में, पाश्चात्य देशों में विज्ञान-शास्त्र की बड़ी उन्नति हुई। वह वैज्ञानिक युग था। सत्य का अन्वेषण करने वालों को पुरानी लकीर पीटना पसन्द न था। डार्विन की पुस्तक - जीवों की उत्पत्ति - (Origin of the Species) ने सर्वत्र बड़ी हलचल सी मचा दी। हक्सले, टिन्डल, हेकल इत्यादि विद्वानों ने बरसों के कठिन परिश्रम से जो वैज्ञानिक तत्त्व आविष्कार किये उनसे लोगों के पुराने विचारों की जड़े हिल उठीं। विकासवाद के साथ ही और भी कितने ही वादों का प्रचार बढ़ता गया। इन सब बातों से ईसाई धर्म की पुरानी और मज़बूत इमारत को ऐसा धक्का पहुंचा कि वह हिलने लगा। उसकी नींव बहुत ही कमज़ोर हो गई। तथापि बाइबल की सदाचार-शिक्षाओं का खण्डन करना किसी भी विज्ञानवादी ने उचित न समझा। इस विषय में सभी पुरानी लकीर के फ़क़ीर बने रहे । यह काम हाथ में लेने का साहस निट्शे ही ने किया। यही कारण है कि उसे अपने विपक्षियों से इतने दुर्वचन सुनने पड़े और वह कितनी ही ग़लतफहमियों का शिकार बन रहा है।
जिस समय मनुष्य किसी विशेष ग्रन्थ या किसी विशेष महात्मा की बातों में अन्धविश्वास करना नहीं चाहता उस समय उसके सामने यह प्रश्न उपस्थित होता है कि किसी आचरण के अच्छे या बुरे होने का सच्चा प्रमाण क्या है? जब हम आप्तवचनों का मानते हैं तब तो कुछ हर्ज़ ही नहीं, पर जब हम एकमात्र अपनी बुद्धि को ही मार्ग-दर्शक बनाना चाहते हैं तब समस्या बड़ी जटिल हो जाती है। प्रतिदिन हम ऐसे हज़ारों काम करते, देखते या सुनते हैं जिनके विषय में हम अपनी सम्मति क्षण भर में स्थिर कर लेते हैं- अपनी बुद्धि के अनुसार उन्हें 'भले' या 'बुरे' कहने में कुछ भी विलंभ नहीं करते। यह ठीक है कि इन विषयों में हम अपने ज्ञान - अपने अनुभव से काम लेते हैं, पर फिर भी यह जानना ज़रूरी है कि किसी काम के 'अच्छे' या 'बुरे' होने की जाँच करने की कसोटी कौन सी है? इस सम्बन्ध में बड़ा मतभेद है। अतः कारणावाद का खण्डन करके ग्रन्थकार मिल ने उपयोगिता-वाद का प्रचार किया। हर्बर्ट स्पेन्सर ने लिखा- "आचरण-सम्बन्धी ज्ञान का विकास सामाजिक जीवन की गति के अनुसार होता है। यदि समाज में प्रत्येक मनुष्य मनमानी करना चाहे-यदि पारस्परिक संघर्षण की मात्रा बढ़ती चली जाय- तो उसमें घोर विप्लव उपस्थित होगा; वह बहुत दिनों तक न ठहर सकेगा। अतएव प्रत्येक व्यक्ति को समाज में उसी मार्ग से चलना पड़ता है जिसे अधिकांश मनुष्य अच्छा समझते हैं। कुछ काल में उसी मार्ग से चलने की प्रथा पड़ जाती है, और, लोगों को इस सामाजिक नियम के विरुद्ध आचरण करने का साहस नहीं होता। इसी प्रकार हमारे अन्तःकरण की जड़ जमती है"। निरस्तिवादियों/नास्तिवादियों (Nihilists) का भी कहना प्रायः यही है। अब फ़्रेडरिक निट्शे के विचार भी संक्षेप में सुन लीजिएः-
"इतिहास से जान पड़ता है कि प्राच्य या प्रतीच्य सभ्यता के प्रारम्भकाल में, प्रत्येक देश- प्रत्येक समाज में दो दल विद्यमान थे। एक बलवान् और दूसरा निर्बल था। पराधीन हो जाने पर निर्बल जातिया अपने बलवान् स्वामियों की सेवा करती थीं। इसी से उनका पालन-पोषण होता था। बलवान् स्वामी अपने निर्बल सेवकों को घृणा की दृष्टि से देखते थे, निर्बल सेवक अपने स्वामियों से असन्तुष्ट रहते थे। आर्य श्रेष्ठ थे और अनार्य्य म्लेच्छ। एक जाति अपने को सभ्य और दूसरी को बर्बर समझती थी। यहीं पर अच्छे और बुरे का भेद शुरू हुआ। स्वामी को वीरता पसन्द थी। इसी से वह बल, साहस, धोखेबाज़ी, यहाँ तक कि निर्दयता को गुण समझता था। भय, चापलूसी, नम्रता, मिथ्या भाषण इत्यादि उसकी दृष्टि में दोष थे। उसका विश्वास था कि अपने सेवकों के साथ मनमाना बर्ताव करने का उसे पूरा अधिकार है। वह चाहे उन पर दया दिखावे, चाहे अत्याचार करे। पर साथ ही, अपनी बराबरी के लोगों को उसे और ही दृष्टि से देखना पड़ता था। वृद्ध पुरुषों का सम्मान करना, अपने प्रभु की आज्ञा का पालन करना, चिरागत प्रथाओं का सत्कार करना, उसके आवश्यक कर्तव्य थे। उसकी समझ में ऐसा कोई भी आचरण अच्छा नहीं कहा जा सकता था जिससे उसकी जाति के बल का ह्रास हो सकता था"।
"विजित जातियों का व्यवहार ठीक इसके विपरीत था। उसके जन-समुदाय अपने जीवन से असन्तुष्ट थे। उन्हें अपने शासकों से घृष्ण थी। निर्बल होने के कारण उनके मत में दया, सुशीलता, धैर्य, अध्यवसाय (परिश्रम), नम्रता इत्यादि गुण थे। मनुष्य में इन बातों का होना वे अच्छा समझते थे। ज़ारो-जुल्म और सख्ती के काम इनकी समझ में बुरे थे। इस तरह संसार में दो नीतिमार्गों की सृष्टि हुई- एक शासक और दूसरा शासित जातियों के लिए। ऐसी अवस्था में, समाज में, भिन्न भिन्न प्रकार के मनुष्यों के रहते हुए, सभी के लिए एक ही मार्ग ठीक समझना उचित नहीं। शेर की भलाई में बकरी की बुराई है। फिर, यदि दोनों को एक सदाचार की शिक्षा दी जाय तो उसका नतीजा कैसा खराब होगा? अतएव, हमें सदा ही स्मरण रखना चाहिए कि कहीं हम धोखे में आकर सेवकों के हित को अपना हित न समझ लें, और जो बाते उनकी दृष्टि में गुण हैं उनको हम भी गुण न मानने लगे"।
निट्शे के ऊपर सबसे अधिक दोषारोपण इसी लिए किया गया है कि वह दीन-दुखियों के ऊपर दया दिखाना पाप समझता है। उसका कहना है कि जो मनुष्य दुर्दशा-ग्रस्त, अतएव दुखी है, उसकी सहायता करने से उसके साथ सहानुभूति दिखाने से - संसार में दिन पर दिन कमज़ोरी बढ़ती जायगी, लोगों को अपने पैरों पर खड़े होने की-स्वावलम्बन की शिक्षा न मिलेगी। निट्शे सुप्रजनन-शास्त्र (Eugenics) के जन्मदाताओं में से था। दुर्बलता उसकी समझ में मृत्यु की निशानी है। वह मानव जाति की पीड़ाओं की परवाह नहीं करता। यदि कोई किसी दुःख या व्याधि से पीड़ित है तो पीड़ित रहे। हमें उसके साथ आँसू बहाने से क्या लाभ? हाँ, यह उसका धर्म है कि वह अपनी अवस्था सुधारने के लिए प्राणपण से चेष्टा करे। अपनी अशक्तता दूर करने के लिए शक्ति-सञ्चय करना सीखे।
ऊपर जिन पुस्तकों का उल्लेख हो चुका है उनके सिवा और भी कितनी ही पुस्तकें निट्शे ने लिखी हैं। ��च पूछिए तो संसार में उसकी किसी से नहीं बनी। मिल, स्पेन्सर, डार्विन, शोपनहार, वागनर इत्यादि सभी विद्वानों के मतों का उसने तीव्र प्रतिवाद किया। स्पेन्सर ने लिखा था- "जीवन चञ्चलता का नाम है"। इस पर आप बहुत खफा हो गये। आपने लिखा- "नहीं- जीवन बलप्रयोग, अत्याचार, छीनाझपटी और क्रूरता का नाम है; सिर्फ़ समझ में नहीं आता" ।
जैसा कि प्रारम्भ में कहा गया है, निट्शे की शिक्षाओं के सम्बन्ध में विद्वानों में बड़ा मतभेद है। उदाहरण लीजिए । एक अँगरेज़ी मासिक पत्र में किसी लेखक ने लिखा था:- "The Nietzsche craze went so far that many people called him a spiritual master…..One wonders how some English writers could really pronounce him to be a great genius in moral philosophy" इत्यादि। और, ��सी पत्र की दूसरी संख्या में एक प्रसिद्ध विद्वान् अपनी सम्मति देता है- Nietzsche was a highly spiritual teacher, a prophet in the real sense of the term, being in the direct line of those Great teachers who have come from time to time to encourage men to fight against sin, the world and the Devil.
1888 में निट्शे का दिमाग़ बिगड़ गया। बहुत कोशिश करने पर भी वह अच्छा न हो सका। 1900 के अगस्त मास में वह इस संसार से चल बसा। तब से उसके भक्तों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती ही गई। यूरोप की प्रायः प्रत्येक भाषा में उसके ग्रन्थों के अनुवाद निकले। उनकी कितनी ही अनुकूल और प्रतिकूल समालोचनायें हुई। किसी ने सरस्वतीसदन में उसे बहुत ही ऊँचे आसन पर बिठाना चाहा, किसी ने उसकी बातों को पागल की बकवास मात्र समझा। इसी बीच में यूरोप में महाभारत शुरू हो गया। लोगों को निट्शे की और भी अधिक याद आने लगी। तब से बराबर उसके ऊपर सैकड़ों लेख निकल रहे हैं। लोग अपनी अपनी कलम लड़ा रहे हैं। पर अभी तक सत्यासत्य का निर्णय नहीं हो सका। शायद इसके लिए और भी अधिक समय लगे ।
"तस्मात्प्रवर्तय सखे सततं परीक्षाम्"
Hence my friend trigger your exploration continuously