#25

ज्ञान हो

अगर तुम्हें है भान कुछ, मनुष्यता की आन का

यौवन··हिन्दी

किसी नई विधा या विषय का अध्ययन करते समय, बहुत मुमकिन है कि हम उसे जानने सीखने के क्रम में गलत राह पर अग्रसर हो जाएं। ऐसा अमूमन गुरु के ना होने से होता है, ऐसा अमूमन आधे ज्ञान की वजह से होता है। कोई भी नई विधा समर्पण मांगती है, कुछ सीखने के क्रम में सबसे पहला कदम समर्पण है। समर्पण ये मानना हो सकता है कि हम अबोध हैं, समर्पण का अर्थ हो सकता है हमे जिसका बोध है उसका विस्मरण कर अपने गुरु के विचारों का अध्ययन करें, यही उपनिषद परंपरा है। जीवन में हम आज तक जो भी सीख पाएं हैं वो सब बिना समर्पण मुमकिन नहीं था और अगर पुनः विचार करें तो हम देख पाएंगे कि समर्पण ही हमारे ज्ञान की नीव है। अहंकार तक पहुँच पाने में भी समर्पण से ही हो कर गुज़रना पड़ता है। इसका अर्थ तो ये है कि,यदि कोई विद्वान हमे अहंकारी प्रतीत होता है, बहुत मुमकिन है वो हमारी ही तरह समर्पण से हो कर गुज़रा हो। इसका अर्थ क्या ये नहीं की हम भी विद्वत्ता की ओर बढ़ रहे हैं, किसी के पास गुरु का मार्गदर्शन है तो कोई परिचित अपरिचित को जान कर सार्थकता तक जा रहा है। एक विषय पर हमें विचार करना अहम है। हम आज के समय में नए पुराने दार्शनिकों को देखते,पढ़ते,सुनते हैं, हम उनकी कहानियों से भी वाकिफ हैं। क्या हमें उनसे ये नहीं सीखना चाहिए कि ज्ञान की खोज ठीक है, सवाल पूछना ठीक है, परंतु जो ज्ञान हम पहले ही अर्जित कर चुके हैं, उसकी अहेमीयत पहले हो जाए तो बेहतर है। इसे ऐसे देखते हैं, यदि हम हर चीज़ को तोड़ते जाएंगे, उसके सूक्ष्म तक पहुँचने में तो हमारा कितना समय व्यर्थ होगा, सवाल पूछने का अर्थ ये नहीं की हम सतह से शुरू करें। सवाल पूछने की प्रक्रिया इससे विपरीत भी हो सकती है, यानि जिस ज्ञान परंपरा में हम खोज कर रहे हैं उस परंपरा के विद्वानों से सीख ली जाय, उनके विचारों की नींव पर स्थिर हों। निट्शे ने अपने पथ पर अग्रसर होने के लिए शोपनहार का सहारा लिया था। ज्ञान मार्ग में जटिलता की जगह कुछ काम मालूम होती है। यदि अपने अनुभव के कारण हम जटिल होते हैं तो उस विषय पर अध्ययन करना उचित है। ज्ञान के क्षेत्र में जब भी कोई क्रांति हुई है,जिस ने भी क्रांति की है,उसने किसी नींव पर कदम रख कर क्रांति की है। नई नींव जिन्होंने रखी वे भी समर्पित हुए,तभी जान पाए। कुछ जान पाने के लिए सवाल ��हीं,समर्पण जरूरी है।

प्रणाम!