चौरासी सिद्ध
कवि होना तो मानो सिद्ध होने के लिए अनिवार्य था

प्रणाम,
बीते माह आध्यात्म के विषय में अध्ययन करते समय मुझे चौरासी सिद्धों के बारे में पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ, फिर कुछ लेख जोखा मिला जिसके आधार पर कुछ बोध ले आया हूँ।
चौरासी सिद्ध शब्द अब भी बिहार और युक्त-प्रांत में सर्व-साधारण तक में प्रसिद्ध है, तो भी चौरासी सिद्धों के नाम कोई भी नहीं बतला सकता। एक ओर ये ही चौरासी सिद्ध हिन्दी के आदि कवि हैं तो दूसरी ओर बौद्ध-धर्म में वज्रयान-संप्रदाय की नींव डालकर भयंकर क्रांति करनेवाले भी ये ही हैं। भारत के साधकों में अनेक प्रसिद्ध आसनों और मुद्राओं के प्रचार करने वाले भी ये ही थे। भैरवीचक्र तथा गुह्य समाजों को एक समय लोकप्रिय कर देने का भार भी इन्ही को प्राप्त था। हजारों मंत्र-तंत्र और सैकड़ों बीभत्स देवी-देवताओं के सृष्टा भी ये ही थे। इस प्रकार इतिहास, साहित्य, योग, मंत्र-शास्त्र, दर्शन आदि कई दृष्टियों से इन पर विचार किया जा सकता है। परंतु इस छोटे से लेख में सब विषयों की चर्चा नहीं हो सकती।
चौरासी सिद्धों पर प्रकाश डालनेवाली अधिकांश सामग्री तिब्बती भाषा में है, कुछ थोड़ी सामग्री नेपाल से भी मिल सकती है। दोनों देशों में आजकल बौद्ध-धर्म है वह वस्तुतः चौरासी सिद्धों का प्रचारित धर्म है। सिद्धों को गुरु भी कहते हैं। तिब्बती शब्द ‘लामा’ का भी अर्थ गुरु है। तिब्बत के लामाओं का धर्म उत्तरी भारत के आठवीं से ग्यारहवीं शताब्दी के बौद्ध-धर्म का बहुत कुछ शुद्ध प्रतिनिधि है। आज कल के बहुत से संप्रदाय यह जानकार हैरान होंगे की उनके पारिभाषिक शब्द, उनकी रहस्य-क्रियाएं, भावनाएं जाकर इन्हीं सिद्धों से मिलती हैं। सिद्ध सभी के सभी वाममार्गी थे। यद्यपि यही बात तिब्बत में सुनी जाती है, तो भी उनकी दूसरे प्रकार की शुद्ध गंभीर कृतियों के देखने से दिल इसे सहसा मान लेने को तैयार नहीं होता की वे वाममार्गी थे। भावना और शब्द-साखी में कबीर से ले कर राधास्वामी तक के सभी संत चौरासी सिद्धों के ही वंशज कहे जा सकते हैं। कबीर का प्रभाव जैसे नानक तथा दूसरे संतों पर पड़ा और फिर उन्होंने अपनी अगली पीढ़ी पर जैसे प्रभाव डाला, इसको श्रंखलाबद्ध करना कठिन नहीं है। किन्तु कबीर का संबंध सिद्धों से मिलाना आसान नहीं है, यद्यपि भावनाओं, रहस्यों-कृतियों, उलटी बोलियों की समानता में बहुत स्पष्ट है। फरक इतना ही है कि कबीर ‘साकट’ को फूटी आँख से भी नहीं देख सकते जब कि ये सिद्ध बहुत हद तक शांत ही कहे जा सकते हैं। इनकी भी बहुत सी प्रिय देवता-देवियाँ ही वज्रतार, वज्रयोगिनी, विजय, वराही, आदि देवियाँ हीं थीं। तिब्बती-साहित्य की सहायता से हम इनकी धारा को बारहवीं शताब्दी तक ला सकते हैं। लेकिन बाद की कबीर तक की तीन शताब्दियों का भरना असंभव सा ही मालूम होता है।
चौरासी सिद्धों में से कितनों पर कुछ बंगाली विद्वानों ने प्रकाश डाला है, किन्तु एक तो मूल तिब्बती सामग्री उनके पास पर्याप्त नहीं, अनुवाद भी पुराने और अधूरे हैं, दूसरा सबसे बाद दोष उनका प्रांतीय पक्षपात है, जिससे वहाँ के बड़े विद्वान भी बरी नहीं हैं।
सिद्धों की परंपरा को हम मोटे तौर पर बिहार के पालवंश के साथ उत्पन्न और समाप्त मान सकते हैं। इनके चौरासी नामों की तालिका में हम प्रथम नाम ‘लुईपा’ का पाते हैं, यद्यपि काल-क्रम के अनुसार नागार्जुन महायान माध्यमिक संप्रदाय के संस्थापक कभी नहीं हो सकते। यह या तो कल्पित नाम है या यदि कोई सिद्धआचार्य इस नाम का हुआ है तो वह पुराने नागार्जुन के चार-पाँच शताब्दियों के बाद हुआ है। पंकज, नागबोधि और लुईपा सबसे पुराने सिद्ध हैं, जिनका काल सातवीं शताब्दी का अंत है। नारोपा और उनके शिष्य कुसुली अंतिम सिद्ध हैं। कुसुली कई हुए हैं, इसलिए नारोपा का शिष्य 84 सिद्धों में एक है या दूसरा यह कहना अभी मुश्किल है। नारोपा दीपंकर श्रीज्ञान के गुरुओं में थे। और इस प्रकार उनका समय दसवीं शताब्दी का अंत माना जा सकता है। इस प्रकार चौरासी सिद्धों का समय यही तीन सौ वर्ष है। तिब्बती तनजूर में उनकी पूरी नामावली तथा उनके कुल और समय का उल्लेख हुआ है।
इन सिद्धों में कितने ही संस्कृत के धुरंधर पण्डित और ग्रंथकार थे। कवि होना तो मानो सिद्ध होने के लिए अनिवार्य था, और सो भी देशी-भाषा का कवि। मातृभाषा की इनकी कविताएं अधिकतर दोहा-गीति या दोहा-कोष-गीति, वज्रगीति, दृष्टि या चर्या-गीति के नाम से प्रसिद्ध हैं। पुराने हिन्दी महकवियों के लिए रीतिग्रंथ लिखना जैसे आवश्यक था। लुईपा, सरहपा और कणहपा के दोहा-कोष तिब्बत में ‘दोहा-कोखा सुम्’ (तीन दोहा कोष) के नाम से प्रसिद्ध हैं। वज्रगीतियों में कणहपा, नाड़पा और शवरीपा की अधिक प्रसिद्धि है। चार्यगीति, महामुद्रा गीति आदि नाम से बहुत से इनके गीत भी हैं। कुछ गीतों का अब भी नेपाल बौद्धों में प्रचार है। किन्तु उनकी भाषा बहुत बदल दी गई है।
इन सिद्धों की कविताएं एक विचित्र आशय की भाषा को लेकर होती हैं। इस भाषा को संध्या-भाषा कहते हैं, जिसका अर्थ अंधेरे (वाममार्ग) में तथा उजाले (ज्ञानमार्ग, निर्गुण) दोनों में लग सके। संध्या-भाषा को आजकल के छायावाद या रहस्यवाद की भाषा समझ सकते हैं। नेपाली लोगों की पूजा में गाएजानेवाले भजनों के चचो नामक संग्रहों में भी बहुत से गीत चौरासी सिद्धों के मिलते हैं।
चौरासी सिद्धों की महिमा का बखान किसी पृष्ठ पर करना कुछ बेतुका मालूम होता है। इस लेख में कई बार आए शब्द वाममार्ग पर विचार करना हमारे लिए नए आयाम खोज लाता है। वाममार्गी होना जीवन को किस तरह सरल और जीवंत बना देता है, इस पर विचार काभी और।
आशीर्वाद।