जब शहर हमारा सोता है
रात रौशनी मद्धम थी और खम्बा झिलमिल करता था
यौवन··हिन्दी
Oil Painting - Gustave Courbet
‘जब शहर हमारा सोता है, तो मालूम तुमको क्या क्या होता है?’ ऐसी ही एक रात की बात। ये कविता अमूमन दो साल पहले हुई, या उससे भी पहले। मैं बैंड बल्लीमारान को पहली बार सुन कर घर लौट रहा था। ये सर्दियों की बात है, घर लौटते समय मेट्रो में बैठे-बैठे देर रात इस कविता के पहले कुछ ख्याल हुए और फिर कविता अपना शिल्प लेती गई। मुझे ये कविता कुछ रोचक मालूम होती है इसलिए आप लोगों से साझा कर रहा हूँ।
रात रौशनी मद्धम थी
और खम्बा झिलमिल करता था
अंधियारे के सुनेपन से
जी तिलमिल तिलमिल डरता था
ऐसी राह तो आज मिली है
मिली है जाने आज ही क्यूँ
चाँद की आभा की माया
सूरजमुखी खिली है यूँ
मैं कुछ देरी में जान गया
ये रात ज़रा अंजनी है
सब कुछ उल्टा दिखता है
फिर कई सदियों में आनी हैं
रास्ते में एक कुत्ता बैठा
गीत मनुष से गाता है
बोला मैं भी बोल सकूँ हूँ
तू ही क्यूँ इतराता है
ज्यों ही देखा कुत्ते को
मैं कुत्ते की ओर बढ़ा
कुत्ते से कुछ बातें की
हैरानी से पारा चढ़ा
अपनी बातों में कुत्ते ने
डिप्लोमेसी दिखाई थी
नाले में रहता था साला
मेहनत की तरकीब बताई थी
दो बातें फिर घर की करली
रोना रोया नौकरी का
वो तो मुझको क्या ही रोता
मैं ही रो लिया छोकरी का
मेरी हालत देख के शायद
तरस उसे कुछ आया था
बूझ पड़ा वो मैंने आखिर
खाना किस दिन खाया था
मेरी आखों में आंसू थे
कुत्ता गले लगाए था
मैं सिसक सिसक के रोता था
वो मुझ तक हाथ बढ़ाये था
कुत्ते मियां बोल पड़े की
आओ ज़रा तुम रोटी पर
खाने वाले का ही नाम लिखा है
चिकन की बोटी बोटी पर
अजब रात है मालिक ये
यहाँ सब कुछ कैसे होता है
मैं हर दम सोता ऐसे हूँ
ओर अलग सवेरा होता है
सुबह सवेरे गाली सुनता
दुनिया गाली देती बोतल को
गाली सुनके कुत्ता उठता
मैं झट रख लेता बोतल को
कैसी रातें दिखलाती है
ये बोतल कितनी न्यारी है
बहुत हुआ अब नौकर, कुत्ता
अब लड़की की तैयारी है
घुमा फिरा के बात सभी
लड़की पर आ जाती है
बोतल पी के उनसे बोलूं
मुझको कुत्ता कह जाती है