स्थिरता
सुनि न होई यह निसिचर घोरा। मानहु सत्य वचन प्रभु मोरा॥

किसी विषय या दिशा में शोध करने का, जानने का एक ही लक्ष्य है की हम एक ऐसे विचार पर पहुँच जाएं जो स्थिर हो, स्थिरता के होने को हमने सैकड़ों वर्षों से जो अहमियत दी है, उसी का कारण है कि हम सभी अस्थिर विचारों को हटा देना चाहते हैं। उन सब विचारों को हटाने के क्रम में, सबसे पहले हमें स्थिर विचारों की स्थापना करनी पड़ेगी, बिना स्थिर विचारों की स्थापना किये अस्थिर को नहीं हटाया जा सकता। इसी में एक भेद ये आता है कि हम पहचान कैसे करें कि ये जो हम हटाने जा रहे हैं, हटाना चाह रहे हैं व��� अस्थिर हैं। इस प्रकृति में जो भी हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नज़र आता है वो निरंतर बदलाव के क्रम में आगे बढ़ रहा है। जो हवा हम तक पहुंची थी, जिसने हमें साँस दी थी, वैसी हवा अब आगे कभी नहीं आएगी, अब हम यूं ना कह सकेंगे कि हवा वो ही है, हवा की जो भी विशेषताएं हमने महसूस की, वे भी वही ना रहेंगी। स्थिरता की स्थापना और अस्थिर को हटाने के लिए, हमें अमूमन हर एक चीज़ को जानना अहम है, हर एक चीज़ के मूल को जाने बिना उसे खारिज करना थोड़ा अस्थिर मालूम होता है। बीती शताब्दियों के बुद्धिजीवियों को पढ़ने पर हम जान पाते हैं कि जिस भी व्यक्ति विशेष ने कोई सूत्र दिया, उस सूत्र का आधार इसी से निकला कि वो क्या नहीं है। किसी चीज़ की ना होने की विशेषताएं ही उसके होने का प्रमाण और विशेषताएं हैं। एक बुद्ध दार्शनिक हुए, नागार्जुन, जिन्होंने शून्यता का सिद्धांत दिया, और बताया कि किसी भी चीज़ में सबसे स्थिर विशेषता है, उसकी अस्थिर होने की प्रकृति। इसी तरह यदि हम यूं जान लेने में सफल हो जाते हैं कि ये क्या नहीं है, उसका कोई खास अर्थ ना होगा। जितनी देर हम खुशी मनाएंगे की हमने पा लिया कि ये नहीं है, उतनी ही देर में वो चीज़ बदलाव के क्रम में आगे बढ़ जाएगी और हमारी खुशी एक क्षण की सफलता के अतिरिक्त और कुछ ना होगी। आध्यात्म में ये सहूलत नहीं है कि हम 'यूरेका-यूरेका' चिल्लाते अपने ध्यान ग्रह से भाग जाएँ, जैसे ही हमें ज्ञान हुआ की हमने प्राप्त कर लिया है, हमने जान लिया है, उसी पल हम उसे खो भी देंगे। विज्ञान को एक सहूलत है कि वो विघटनवाद द्वारा एक चरम से दूसरे चरम तक पहुँच ही जाता है, परंतु आध्यात्म तो हर पल होते बदलाव से जुडने का अर्थ है, जो प्रत्यक्ष नहीं भी है उसको जान लेना आध्यात्म का लक्ष्य है। स्थिरता को जानने के लिए, नागार्जुन कि सहायता लेना आसान है, नागार्जुन का कहना है कि यदि हम देखते हैं कि एक वस्तु, एक घड़ा खाली है, तो हमें ये जानना अनिवार्य हो जाएगा कि ये किस चीज़ से खाली है। इसी प्रकार अस्थिर चीज़ को जो स्थिर बना रहा है, उसे जानना अनिवार्य हो जाता है। इसी क्रम में आगे ये सवाल आता है कि जो वस्तु हम देख रहे हैं उसके अस्तित्व की विशेषता क्या है और क्या हम मनुष्य उस संदर्भ में उस वस्तु को देख पा रहे हैं। सभी विचरों के आधार पर एक सरल सूत्र को समझा जा सकता है, यदि हम किसी वस्तु के विषय में बात करते हैं तो हम निर्मित कर सकते हैं कि उस वस्तु की ऐसी क्या विशेषता है जिसके बिना उसका अस्तित्व, उसका महत्त्व ही नहीं होगा। यदि हम स्वभाव के माध्यम से ही समझें तो यदि आग से उसका गर्म स्वभाव ले लिया जाए तो वो आग ना रहेगी। अब यहीं एक सूत्र निर्मित हो जाता है जो कहता है कि कोई भी वस्तु कैवल्य में विद्यमान नहीं हो सकती, उसका होना किसी दूसरी वस्तु के होने पर निर्भर है। हम यदि इसी क्रम से चलें तो निर्भरता के आधार पर अज्ञान की धारा पर हम एक ऐसा पुल निर्मित कर पाएंगे जो स्थिर हो। इस सूत्र को जान लेने का अर्थ ये है कि ऐसा कोई मूल तत्व नहीं है जिस पर एक वस्तु का अस्तित्व आधारित हो। यदि हवा ना होगी तो हमारा अस्तित्व नहीं होगा, हमारा अचेतन मन और ज्ञान किसी काम का ना होगा। पंचतत्वों में से किसी एक तत्व के ना होने से या ईश्वर की निर्धारित सीमा से ऊपर हो जाने से इस धरती और हमारा कोई अस्तित्व ना होगा, वैसे ही स्थिरता के क्रम में निर्भरता के ना होने से वो पुल निर्मित ही नहीं हो पाएगा। स्थिरता का अस्तित्व इस पर निर्भर करता है कि कुछ ऐसा स्थिर अस्तित्व में हो जो उसे अस्थिर बनाए रखे।