#21

सप्रेम भेंट

हाथ में मेरे हाथ तुम्हारा और बचपन का भ्रमण है याद मुझे

यौवन··हिन्दी

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कॉलेज के समय में प्रेम-प्रसंग की बातें करने के बाद, कवि कुमार विश्वास को पढ़ने सुनने के बाद, एक कविता हुई। ये कविता अपने शिल्प के बूते पर भले ही कुछ मोल ना रखती हो, परंतु यह कविता मुझे वही सब दृश्य दिखा देती है जो मैंने उस समय देखे जब ये कविता हुई। ये कविता मुझे याद दिला देती है मेरा सर्दियों में सुबह घर से निकलना और कॉलेज जाते समय विश्वास कुमार की कविताएं पढ़ना। विश्वास जी की अनेकों कविताएं मुझे प्रिय हैं, परंतु आज भी जिस कविता को पढ़ कर मैं पहली बार का ही आनंद लेता हूँ वो ��विता है ‘मांग की सिंदूर रेखा’ और अपने कॉलेज के दिनों में जो कविता पढ़ कर भाव उमड़ उठते थे कि प्रेम का कथन इससे बेहतर नहीं हो सकता, वो कविता है ‘थोड़ी का तिल’। इन्हीं सब एहसासात के साथ एक कविता।

बाल खुले हैं आज तुम्हारे
कैसा समन्वय बैठा है
आँखों का हल्का सा काजल
पुतली पर चांद सा बैठा है

तेज तुम्हारा सीता जैसा
राधा, रख दूं नाम तुम्हारा?
रुक्मण सा तुम मोह करोगी?
रंग में तेरे श्याम दीखे हैं
हाथों की ये डोर तुम्हारी
इसने कितने दिल अब थाम रखे हैं

नयन नक्श के छली इशारे
आंसू के भी दाम रखे हैं
तुम ही बोलो मैं जो सुन लूं
शब्द ह्रदय में थाम रखें हैं

ठोड़ी पर तुम हाथ टिकाये
मुझे ही देखा करती हो
मैने भी कुछ खेल रचाये
हर खेल में तेरे नाम रखे हैं

तुम्हें देख मुझे ज्ञात हुआ
तुझ संग मेरे सुब शाम लिखें हैं
घडी तुम्हारी टक टक चलती
ये पल मेरे सब नाम लिखें हैं
हाथों की वो डोर तुम्हारी
इसने कितने दिल अब थाम रखे हैं

माथे पर चंदन शीतल है
चांदी का है हार तुम्हारा
ज्योति सी जलती है नभ में
पूजन में तुमने थाल रखे हैं
हाथों की ये डोर तुम्हारी
जाने कितने दिल अब थाम रखे हैं

फूलों की माला जो तुमने आज बनायीं
चौखट पर महके फूल खिले हैं
हाथों की ये डोर तुम्हारी
इसने कितने दिल अब थाम रखे हैं

श्वेत सुभग कुर्ती तुम्हारी
परिचय तुम्हारा देती है
दर्पण बन आंखों में रख लूं
हल्दी में लिप्टे गाल तुम्हारे
नीली चुनरी सुंदर मुस्कान है
नीले कंगन हाथों में डाल रखें हैं
कितने दिल अब थाम रखे हैं

फ़र्श पे बिखरे रंग अनेकों
आनन से  उद्दण्ड दिखें हैं
लड्डू, मोती, प्रेम प्रबंधन
गौरी के सुत ने थाम रखें हैं
उजले दीपक, मंद हवा
नक्षत्र चमक हर याम जले हैं
इसने कितने दिल अब थाम रखें हैं

हाथ में मेरे हाथ तुम्हारा
और बचपन का भ्रमण है याद मुझे
सभी की हैं करुणामय आंखें
होता इसका भी आभास मुझे
सुंदर से कुछ चित्र हमारे
हर रंग में मैंने ढाल रखे हैं
हाथों की ये डोर तुम्हारी
इसने कितने दिल अब थाम रखे हैं

मेरे बचपन की बातें
अक्सर तुम ही बतला देती हो
शीशम का पेड़
धूप तपन
और मिट्टी से कुछ खेल करे हैं
हाथों की ये डोर तुम्हारी
इसने कितने दिल अब थाम रखे हैं