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मिर्ज़ा ग़ालिब के अनोखे पत्र

खुशी है हमें आने की आपके कि बाहम पियें बादा और आ��� खाएं

यौवन··हिन्दी

image Fruits of Experience - Abdur Chugtai संसार की अनेक भाषाओं में पत्रों को बड़ा महत्त्व प्राप्त है। वे साहित्य के मुख्य अंग समझे गये हैं, क्योंकि उनसे बहुत-सी ऐसी बातें प्रकट हो जाती हैं जो लिखनेवाले की बात-चीत, वक्तता अथवा लेख आदि से नहीं जानी जा सकतीं। जहाँ तक मुझे मालूम है, हिन्दी में अभी तक केवल स्वामी दयानन्द सरस्वती के ही असली पत्र पुस्तक रूप में प्रकाशित हुए हैं। अन्य किसी के पत्र सम्भवतः अभी तक या तो इस योग्य ही नहीं समझे गये कि वे पुस्तक रूप में प्रकाशित किये जायें अथवा इस कार्य की महत्ता ही अभी प्रकाशकों को नहीं प्रतीत हुई है। परन्तु फारसी व उर्दू में अनेक सुप्रसिद्ध लोगों के पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें साहित्य में अच्छा स्थान मिला है और उनसे अनेक बातों पर अच्छा प्रकाश पड़ा है। मिर्ज़ा ग़ालिब से पहले उर्दू में गद्य या पद्य के कई अच्छे लेखक हो चुके हैं। उन्होंने भी अपने इष्ट-मित्रों सम्बन्धियों को पत्र लिखे होंगे। परन्तु उनकी ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया, क्योंकि ऐसे पत्र पुस्तकरूप में नहीं प्राप्त हैं। मिर्ज़ा ग़ालिब (जो सन् 1797 इसवी में पैदा हुए और सन् 1869 ईसवी में मरे थे) ही पहले व्यक्ति हैं जिनके निजी पत्र पुस्तकरूप में एकत्र किये गये हैं। वे उनके उर्दू-गद्य की वास्तविक पूँजी हैं, क्योंकि उर्दू-गद्य में मिर्ज़ा गालिब की जो रचना है उसका प्रधान अंश, उनकी पत्र-पुस्तक है और उनकी गद्य-रचना में उस पत्र-पुस्तक को विशेष रूप से महत्त्व प्राप्त है। उन पत्रों के अनेक संस्करण अनेक स्थानों से निकल चुके हैं और उर्दू में उनका अच्छा आदर है।

मिर्ज़ा ग़ालिब के इन पत्रों के दो प्रधान संग्रह हैं। एक का नाम 'ऊद हिन्दी' और दूसरे का 'उर्दूय मुअल्ला' है। 'ऊद हिन्दी' का एक नाम 'मेहर गालिब' भी है, परन्तु यह नाम अधिक प्रसिद्ध नहीं है। इसमें बहुत से पत्र उन लोगों के उत्तर में हैं जिन्होंने किसी कठिन शेर (पद्य) का अर्थ पूछा था अथवा अन्य कोई विद्या-विषयक बात पुछी थी।

'उर्दूय मुअल्ला' सन् 1868 ईसवी में प्रकाशित हुआ था। मिर्ज़ा की मृत्यु इसी साल हुई थी। इस संग्रह में 500 से कुछ अधिक पत्र हैं। इसको पत्रों का बृहत् संग्रह और 'ऊद हिन्दी' को लघु संग्रह कह सकते हैं। पर यह बात भली भांति स्पष्ट रहे कि 'ऊद' के बहुत से पत्र ऐसे हैं जो 'उर्दूय मुअल्ला' में नहीं हैं और कुछ पत्र ऐसे हैं जो उक्त दोनों संग्रहों के प्रकाशित हो जाने के पश्चात् प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार मिर्ज़ा के कुल पत्र लगभग 500 ही ठहरते हैं, क्योंकि लगभग 130 पत्र ऐसे हैं जो दोनों संग्रहों में हैं।

मिर्ज़ा के पत्र जिन लोगों के नाम हैं वे निम्न भागों में विभक्त किए जा सकते हैं-

(1) कुछ दूर या निकट के सम्बन्धी हैं।

(2) कुछ विद्या के नाते शिष्य या मित्र हैं। इनमें से कुछ लोगों को मिर्ज़ा से मिलने का अवसर मिला था और कुछ लोगों के साथ जो जान-पहचान थी वह केवल पत्र-द्वारा ही थी ।

(3) मिर्ज़ा के शिष्यों व मित्रों में से कुछ ऐसे थे जिनसे किसी न किसी रूप में मिर्ज़ा को कुछ आर्थिक सहायता मिली थी और कुछ ऐसे थे जिनसे किसी प्रकार की सहायता न पहुँची, बल्कि सम्भवतः मिर्ज़ा ने ही स्वयं उनकी कुछ सहायता की होगी।

इस प्रकार के भेद-भाव होने पर भी मिर्ज़ा का कोई पत्र ऐसा नहीं है जिसकी वाक्य की बनावट से अपने या बेगानेपन की तनिक भी गंध आती हो ।

मौलाना अलताफ हुसेन साहब 'हाली' उर्दू के प्रसिद्ध कवि व लेखक हो चुके हैं। उनको मिर्ज़ा से कई बार मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। उन्होंने ही 'यादगार गालिब' नाम की पुस्तक मिर्ज़ा के सम्बन्ध में लिखी है। उसमें उन्होंने यह लिखा है कि मिर्ज़ा के पत्रों के एक एक अक्षर में स्नेह व प्रेम की झलक है। प्रत्येक पत्र का उत्तर लिखना वे अपना परम कर्तव्य समझते थे। उनका बहुत सा समय मित्रों के पत्रों के उत्तर लिखने में लगता था, यहाँ तक कि बीमारी की अवस्था में भी पत्र लिखने से न विरत होते थे ।

मिर्ज़ा के समय में यह प्रथा थी कि लोग आदर व शिष्टाचार अर्थात् प्रशस्ति के बहुत से शब्द पत्र के आरम्भ में लिखा करते थे। परन्तु मिर्ज़ा के अनेक पत्र ऐसे हैं जिनका श्रीगणेश 'भाई साहब' । 'महाराज' या इस प्रकार के किसी अन्य उचित शब्द से है अथवा कुछ पत्र इस प्रकार के शब्दों से भी शून्य हैं। उनमें आरम्भ से ही काम की बात लिखी गई है।

मिर्ज़ा के समय में अँगरेज़ी-भाषा का कुछ चलन भारत में हो गया था, पर मिर्ज़ा अँगरेज़ी न जानते थे। अतः सम्भव है कि पत्र में आरम्भिक शिष्टाचार की काट छाँट करने का ख्याल उन्होंने अंग्रेजी भाषा से लिया हो। अनेक पत्रों में मिर्ज़ा ने किसी बात को इस प्रकार दर्शाया है, मानो दो व्यक्ति एक-दूसरे से बात-चीत अथवा प्रश्नोत्तर कर रहे हैं।

मिर्ज़ा ने अपने पत्रों में कहीं कहीं मध्यम पुरुष को सम्बोधन करते हुए, प्रथम पुरुष के रूप में भी, बड़े विचित्र ढंग से दर्शाया है। जहाँ कहीं प्रश्न व उत्तर के रूप में बातें होती हैं वहाँ प्रायः ऐसा होता है कि प्रश्नकर्ता व उत्तरदाता का पूरा पूरा नाम अथवा दोनों के नामों को संकेत-मात्र के साथ दर्शाया जाता है ताकि पाठक को ज्ञात रहे कि कहाँ तक प्रश्नकर्ता की बात है और कहाँ से उत्तरदाता की बात आरम्भ होती है। पर मिर्ज़ा ने ऐसे अवसर को बिना नाम अथवा संकेत के निबाहा है। सबसे अधिक मारके की बात विनोद-विषय मात्रा है, जो वस्तुतः मिर्ज़ा के बहुतेरे प्रश्नों का आधार है मानो मिर्ज़ा यह चाहते थे कि पत्र में कोई बात ऐसी लिखी जाए जिससे पानेवाला पढ़कर प्रसन्न हो।

मिर्ज़ा ने एक मित्र को दिसम्बर सन् 1856 के अन्त में एक पत्र लिखा। उन्होंने उसका उत्तर 1858 ईसवी में जनवरी की पहली या दूसरी तारीख को दिया।

उसके उत्तर में मिर्ज़ा ने यह लिखा -

"देखो साहब ! यह बाते हमको पसन्द नहीं। सन् 1856 ईसवी के ख़त का जवाब सन् 1858 ईसवी में भेजते हो और मज़ा यह कि जब तुमसे कहा जायगा तो यह कहोगे कि मैंने दूसरे ही दिन जवाब लिखा है।"

रमज़ान मास में मुसलमान लोग प्रायः रोज़ा (व्रत) रखते हैं। मिर्ज़ा ऐसा नहीं किया करते थे। अस्तु उन्होंने किसी मित्र को रमज़ान मास में पत्र लिखा तब इन शब्��ों में लिखा-

"धूप बहुत तेज़ है। रोज़ा रखता हूँ। मगर रोज़ा को बहलाता रहता हूँ। कभी पानी पी लिया, कभी हुक्का पी लिया, कभी कोई टुकड़ा रोटी का भी खा लिया। यहाँ के लोग अजब फ़हम (विचित्र समझ) रखते हैं। मैं तो रोज़ा बहलाता हूँ और यह साहब फरमाते हैं कि तू रोज़ा नहीं रखता। यह नहीं समझते कि रोज़ा न रखना और चीज़ है और रोज़ा बहलाना और बात है।"

मिर्ज़ा एक पत्र में घोर वर्षा व अपने घर की दशा का चित्र इन शब्दों में खींचते हैं-

"दीवानखाने (बैठक) का हाल महलसरा (निवास- स्थान) से बदतर (अधिक खराब) है। मैं मरने से नहीं डरता। फ़क़दान राहत (सुख के लोप हो जाने) से घबरा गया हूँ। छत छलनी हो गई है। अब दो घंटे बरसे तो छत चार घंटे बरसती है।"

इस प्रकार की छेड़-छाड़ से मिर्ज़ा के शोक-पत्र भी खाली न होते थे। किसी ने उनके उमरावसिंह नामक शिष्य का यह हाल मिर्ज़ा को लिखा था कि उन की दूसरी स्त्री मर गई है। छोटे छोटे बच्चे हैं। अब यदि वे तीसरा विवाह न करें तो क्या करें। इस बात के उत्तर में मिर्ज़ा ने लिखा-

"उमरावसिंह के हाल पर उसके वास्ते रहम (दया) और अपने वास्ते रश्क (अर्थात् लालसा) आता है। अल्लाह ! अल्लाह !! एक वह हैं कि दो दो बार उनकी बेड़ियाँ कट चुकीं (स्त्रिर्या मर चुकी) हैं और एक हम हैं कि एक ऊपर पचास बरस से जो फांसी का फंदा गले में पड़ा है तो न फंदा ही टूटता है न दम ही निकलता है। उसको समझाओ कि भाई तेरे बच्चों को मैं पाल लूँगा तू क्यों (आफत में) फँसता है।"

एक पत्र में मिर्ज़ा ने अपनी बुआ के मरने का वृत्तान्त इस प्रकार उल्लेख किया है-

भाई साहब ! मैं भी तुम्हारा हमदर्द (साथी) होगया। यानी (अर्थात्) मंगल के दिन 15 रबीउलू औवल (हिजरी सन् के तीसरे मास) को शाम के वक्त मेरी वह फूफी मरी कि मैंने बचपन से आज तक उसको माँ (माता) समझा था और वह भी मुझको बेटा समझती थी मर गई। आपको मालूम रहे कि परसों मेरे गोया (मानो) नौ आदमी मरे-तीन फूफियाँ और तीन चचा और एक बाप और एक दादी और एक दादा-यानी इस मरहूमः (स्वर्गवासनी) के होने से मैं जानता था कि यह नौ आदमी ज़िन्दा हैं और उसके मरने से मैंने जाना कि यह नौ आदमी आज एक बार मर गये ।

मिर्ज़ा ग़ालिब के शिष्य तथा मित्र यूसुफ़ मिर्ज़ा के पुत्र का देहान्त पहले ही हो चुका था जब उनके पिता भी स्वर्गलोक को सिधारे तब मिर्ज़ा ग़ालिब ने यूसुफ मिज़ा को यह लिखा था-

यूसुफ मिर्ज़ा क्योंकर तुझको लिखूँ कि तेरा बाप मर गया और अगर लिखूँ तो आगे क्या लिखें कि अब क्या करो मगर सब्र। यह एक शेवः फरसूदा अबूनाय रोज़‌गार (अर्थात सांसारिक लोगों की पुरानी प्रथा) है कि ताजियत (शोक) योंही किया करते हैं और यही कहा करते हैं सब्र करो। हाय ! एक का कलेजा कट गया है और उसे कहते हैं कि तू न तड़प। भला! क्योंकर न तड़पेगा। सलाह इस अमर (कार्य) में नहीं बताई जाती। दुआ को दखल नहीं। दवा का लगाव नहीं। पहले बेटा मरा फिर बाप मरा। मुझसे अगर कोई पूछे कि बे सर व पा (वे सिर व पैर वाला) किसको कहते हैं तो मैं कहूँगा यूसुफ मिर्जा को। तुम्हारी दादी लिखती हैं कि रहाई (छुटकारे) का हुक्म हो चुका था। अगर यह बात सच है जर्चा- मर्द (वीर पुरुष) एक बार दोनों कैदों से छूट गया। न कैद हयात (जीवन की) रही न कैद फरंग (अँगरेज़ों की)।

मिर्जा आम के बड़े ही प्रेमी थे। एक बार की बात है कि वर्षा ऋतु के दिन थे और आम पक रहे थे। उस काल में रियासत लोहारू ज़िला हिसार के नवाब अलाउद्दीनखान ने मिर्जा को अपने यहाँ बुलाया। इस पर मिर्ज़ा ने जिन पद्यों में उत्तर दिया उनका उर्दू अंश यह था-

खुशी है यह आने की बरसात के।
पियें बादयेनाब और आम खाये॥
सर आगाज़ मौसम में अन्धे हैं हम।
कि दिल्ली को छोड़ें, लोहरू को जाये॥
सिवा नाज के जो है मकलूब जान।
न वां आम पाएं न अंगूर पाये॥
हुआ हुक्म बावरचियों को कि हाँ
अभी जाके पूछो कि कल क्या पकाएं॥
वह खट्टे कहाँ पाएं इमली के फूल।
बह कडुवे करैले कहाँ से मँगाये ॥
फ़कत गोश्त सो भेड़ का रेशादार।
कहो उसको हम खाके क्या हज़ उठायें।

नवाब साहब एक अच्छे विद्या-प्रेमी थे और कवि भी थे। उक्त पत्र का जो उत्तर उन्होंने दिया वह उसी छन्द में है जिसमें मिर्जा ने लिखा है और है भी बड़ा मज़ेदार है। अतः लिखा गया है कि-

खुशी है हमें आने की आपके
कि बाहम पियें बादा और आम खाएं
सर आग़ाज़ मौसम में क्या खूब हो
जो दिल्ली से हज़रत लोहारू को आयें॥
अजब लुत्फ़ है यां की बरसात में
कि कीचड़ कहीं नाम को भी न पायें॥
सरौली के वह डाक पर सब्ज़ आम
वह दिल्ली से अंगूर हर शाम आये॥
करें हुक्म बावरचियों को कि हाँ
अभी जाके हर चीज़ जल्दी पकायें॥
वह लें बाग़ से जाके इमली के फूल
वह जंगल से कडुवे करैले मँगायें॥
वह बेरेशा बकरे का लहमेतरी (ताज़ा मांस)
कि क्या क्या उसे खाके हम हज उठायें।
कहें उनको बेमेहर (प्रेमशून्य) व काहिल अगर
लोहारू वह इस बात पर भी न आयें।

मिर्ज़ा ग़ालिब फ़ारसी के बड़े विद्वान थे फ़ारसी गद्य व पद्य दोनों में उनकी रचित काफी रचनाएं हैं। उनके उर्दू-गद्य व पद्य दोनों में कहीं कहीं फ़ारसी का अच्छा रंग है। पर उर्दू में कहीं कहीं वे बहुत ही इबारत लिख गये हैं जैसा कि ऊपर लिखित उदाहरणों से ही स्पष्ट है। इसके सिवा यह भी जान लेना चाहिए यद्यपि साधारणतया लोग मिर्ज़ा को उनके अपूर्व उर्दू-काव्य के कारण उनको अधिक जानते हैं, तथापि यह कहना अनुचित न होगा कि यदि मिर्ज़ा उर्दू-कविता अथवा फारसी गद्य व पद्य में कुछ और न लिख जाते, फिर भी उनके उर्दू -पत्र ही उनकी प्रसिद्धि के लिए साहित्य में अद्भुत वस्तु थे।

अब अन्त में यह बतला देना आवश्यक प्रतीत होता है कि उर्दू में अब अच्छी उन्नति हो गई है और अनेक लोगों ने अपने पत्रों में मिर्ज़ा का अनुकरण करने का उद्योग किया है और अब अनेक लोगों के पत्र पुस्तक-रूप में प्रकाशित हुए हैं, पर सत्य बात यह है कि आज भी इस क्षेत्र में मिर्ज़ा का ही रंग निराला है।