#19

धार्मिक शिक्षा

अन्तःकरण की स्वच्छता, ज्ञान, दान, इन्द्रिय दमन

यौवन··हिन्दी

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हम अपने जीवन में किए गए कार्यों और विरोध को बहुधा धर्म-युद्ध की पदवी दिया करते हैं, पर धर्म वास्तव में है क्या, यह बहुत से निश्चय नहीं कर सकते ���ैं। यही कारण है कि धर्म को अन्धविश्वास समझकर बहुत से लोग इसे हेय समझते हैं। वे कहा करते हैं कि यही हिन्दू-मुस्लिम दंगों, समस्त सामाजिक कुरीतियों तथा अज्ञान का कारण है। धर्म और आस्तिकता के भावों के विरुद्ध आजकल बहुत जहर उगला जा रहा है। एक लेखक ने तो आस्तिकता को इन कडुवे शब्दों में रक्खा है कि “अ��र मुझे ईश्वर मिल जाए तो उसे कच्चा खा जाऊँ” । परन्तु ये शब्द प्रायः वही कहते हैं जो धार्मिक पुस्तकों से या तो बिलकुल अनभिज्ञ हैं या जिनका ज्ञान धार्मिक पुस्तकों के दोषों तक ही परिमित है। वास्तव में धर्म अन्ध-विश्वास नहीं है। कोई भी धर्म हो उसकी नींव प्रेम, विज्ञान और श्रद्धा पर टिकी हुई है। यह जरूर हुआ है कि मनुष्य अपने रूढ़िवाद के वश होकर धर्म को विज्ञान के विरुद्ध बना लेता है। पर ज्ञान और विज्ञान भी मनुष्य की स्वाभाविक शक्तियाँ हैं। जहाँ-जहाँ धर्म विज्ञान के विरुद्ध चला गया है, वहाँ-वहाँ उसके सुधारक भी अवश्य हो गये हैं। यह हमें मानव-इतिहास बतलाता है। ईसाई धर्म में मार्टिन ल्यूथर ने, मुसलमानों में जमालुद्दीन-अल-अफ़ग़ानो ने, और हिन्दुओं में दयानन्द, विवेकानन्द आदि ने रूढ़िवाद के विरुद्ध आन्दोलन खड़ा कर धर्म और विज्ञान के गहरे सम्बन्ध का दिग्दर्शन करा दिया है। पर इसके ये माने नहीं कि सब धर्म एक जैसे ही हों। हाँ, प्राकृतिक नियमों में जो ज्ञान और विज्ञान के आधार पर हैं उनमें तो कोई अन्तर हो ही नहीं सकता जैसे ब्रह्मचर्य-पालन, इन्द्रिय-दमन, काम, क्रोध, लोभ, मोहादि से विरक्ति आदि । मनुष्य एक सामाजिक जीव है और धर्म वास्तव में सामाजिक शर्तें और बन्धन हैं, जिससे कोई उच्छृंखल होकर दूसरों के हितों में ठेस न लगाये, वरन युक्त आचार-व्यवहार से एक दूसरे के सुख में सहयोग दे।

गीता में शास्त्रानुकूल व धर्मयुक्त आचरण में अभय, अन्तःकरण की स्वच्छता, ज्ञान, दान, इन्द्रिय दमन, उत्तम कर्मों का आचरण, स्वाध्याय, स्वधर्म-पालन के लिए कष्ट सहना, सरलता, अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति,, प्राणियों में दया, विषयों के साथ आसक्ति न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध, आचरण में लज्जा, अचपलता, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रु-भाव का न होना, अपनी पूज्यता के अभिमान का न होना, ये लक्षण बतलाये हैं। कोई भी मनुष्य चाहे वह किसी धर्म का हो, विज्ञान के अनुकूल उनके विरुद्ध कुछ भी नहीं कह सकेगा। इसी तरह अज्ञान, क्रोध, कठोरता आदि को विरुद्धाचरण इसीलिए बतलाया गया है, क्योंकि समाज में ये उच्छृंखल के कारण होते हैं।

धर्म का एक महत्त्वपूर्ण अङ्ग है ईश्वर-भक्ति। बहुत से तो ईश्वर की स्थिति में ही विश्वास नहीं रखते और उसे कोरी कल्पना और मिथ्या बतलाते हैं। ईश्वर-भक्ति को वे अन्धविश्वास बतलाते हैं। पर सामाजिक बन्धन प्रेम-द्वारा ही दृढ़ रह सकते हैं। प्रेम, शान्ति और अक्रोध से प्राप्त होता है। और अक्रोध और शान्ति ईश्वर-भक्ति से ही प्राप्त हो सकती है, अन्य किसी भी प्रकार से यह बात अनुभवगम्य नहीं है।

नास्तिकता के भाव रखनेवाले या तो वे अशान्त हृदयवाले, अनुभवरहित, तृष्णा से भरे हुए नव-युवक होते हैं या कामुक और क्रोधी पुरुष होते हैं। इन दोंनों का ही चित्त स्थिर नहीं हो सकता और वे अधिकतर दुखी ही रहा करते हैं। ईश्वर-भक्ति के चाहे जो मार्ग हों, चाहे नमाज हो, सन्ध्या-वंदन हो या गिरजे की प्रार्थना हो, पर सबका उद्देश मानसिक शान्ति और स्थिरता प्राप्त करना है। जिससे ये उद्देश सिद्ध न हों वह मार्ग अवश्यमेव ही गलत है।

वह ईश्वर के स्वरूप पर वाद-विवाद किया करते हैं पर वास्तव में ईश्वर के स्वरूप का कथन बाह्य बहस से नहीं हो सकता, परन्तु उसका स्वरूप ज्ञान-द्वारा अनुभवगम्य ही है। उसके स्वरूप के बारे में तो बहस करना ही व्यर्थ है।

धर्म का एक दूसरा अङ्ग जिसके कारण दोष आ जाते हैं उसकी रूढ़ियाँ हैं। मनुष्य वास्तव में रूढ़िवादी है। अपने पूर्वजों में श्रद्धा रखना व उनका आदर करना तो उसकी प्रकृति है। किसी आवश्यकता के कारण कोई बात प्रचलित की गई। जब आवश्यकता चली गई और समय कुछ अधिक गुज़र गया तब वही रूढ़ियों के रूप में हो गई। धर्म में उनका समावेश हो गया यदि कोई हानि न होती हो तो उन रूढ़ियों को ज्ञान रूप में रहने देना ठीक है।

"यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः"। यह धर्म ही की प्रेरणा है जिससे मनुष्य आत्मज्ञान प्राप्त कर संसार को ठीक रास्ते पर ले जाता है। धर्म ही है जो मनुष्य में सन्तोष, उत्साह, तन प्रेम, तेजस्विता, वीरता आदि उच्च भाव तथा प्राणियों के पारस्परिक सम्बन्ध और अनुचित का ज्ञान कराता है।

इस समय धर्म के ज्ञान की, उसकी खोज में रूढ़ियों के सुधार की अत्यंत आवश्यकता है। मनुष्य-समाज की उन्नति का मूल-कारण धर्म ही है। धर्म का अज्ञान ही सांप्रदायिक लड़ाई-झगड़ों का कारण है। धर्म का ज्ञान विज्ञान से गहरा संबंध है।