स्फुट कविता
ऐसे खेल से मेरी तकल्लुफी शुरू हुई मैं ऐसी राह चल पड़ा की चाह कुछ रही नहीं
यौवन··हिन्दी

प्रणाम!
एक कविता जो लगभग एक साल पहले पहाड़ों में टहलते- टहलते हुई।
वो भी एक दौर था
की मैं सफ़र में था कभी
सफ़र मुझे कचोटता
कि मंजिलें मिली नहीं
सफ़र भी एक साहिर है
जो मैं सफ़र को जीत लूं
ये मशगले धरे रहें
मैं जीत प्रीत–प्रीत लूं
फिज़ा मिली थी रंग से
तो कुछ सफ़र में बात थी
मैं पूर्ण उसके साथ था
वो पूर्ण मेरे साथ थी
एक रोज़ होश में
खयाल कुछ नया खिला
वो मेरी ज़िद से जा मिली
मैं मेरी हद से जा मिला
ये रंज कुछ नया सा था
जो प्रेम से तो दूर था
मैं उसपे तैश में पड़ा
वो भी उसमे पूर था
ऐसे खेल से मेरी
तकल्लुफी शुरू हुई
मैं ऐसी राह चल पड़ा
की चाह कुछ रही नहीं
आज कल की बात है की
आशिकों में नाम था
ये दौर कल ही था अभी
ये दौर बहुत आम सा
- यौवन