कविता - त्रास
क्या देख सकूंगा मैं फ़िर क्षण भर
यौवन··हिन्दी
अभी कुछ समय से कुछ लिखने, मिटाने का सिलसिला चल रहा था। मैं किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पा रहा था की आज कोई लेख लिखा जाए या कोई कविता साझा की जाए। इसी द्वन्द्व में आज कविता साझा करने के निर्णय पर मैं पहुंचा। ये कविता पढिए, स्वागत है।
संदेश
कितने क्षण बीते तुम बिन
अंबर को बाहों में भर
इस क्षण तुम चली आओ
प्रेयसी मेरी त्रास मिटाओ
तुमसे मिलने की खातिर
सावन से कलियां खेली हैं
तुमको ही देख के रंग बहे
पंखुड़ियां हुई अकेली हैं
कीकर के फूलो को
आओ अब तुम खुद समझो
इस क्षण तुम चली आओ
प्रेयसी मेरी त्रास मिटाओ
वर्षा में अल्हड़ मैं घूमा
घूम चुका हूं जग सारा
देख लिया कैलाश द्वार
देखी है निर्मल जल धारा
तुम्हें भी देखा था मैंने
एक खिलती हुई जवानी में
जैसे, घाम बरस्ता हो हिम पर
और, मरुथल हो बहते पानी में
कितना छल था, क्या था सत्य
आकर तुम ही बतलाओ
प्रेयसी मेरी त्रास मिटाओ
हिरण की कस्तूरी है
तन मन में गंध बसाये है
स्वर्णिम रंग में अंश रखा है
मन के संगीत सुनाए है
ढक देते हो कैसे सब कुछ
अपने केसरिया आंचल से
मुझे भी सिखलाओ
प्रेयसी मेरी त्रास मिटाओ
क्या देख सकूंगा
मैं फ़िर क्षण भर
वही बचपन की खुशहाली
क्या साथ निभाएगी पल भर
जीवन की वैशाली
अब आस लगी है तुम पर ही
तुम मुझे रश्मि दिखलाओ
इस क्षण तुम चली आओ
प्रेयसी मेरी त्रास मिटाओ
कितने क्षण बीते तुम बिन
अंबर को बाहों में भार
इस क्षण तुम चली आओ
प्रेयसी मेरी त्रास मिटाओ
- यौवन