#16

क्रांति अमर रहे!

प्रतीकों की स्थापना करना आवश्यक है

यौवन··हिन्दी

image Artist: Kornchawan Chan Owner: Ajarn Keng Nathong

1857 की क्रांति को अनेक विचारकों ने, राजनीतिज्ञों, ने अलग तरह से समझा। किसी के दिल में डर पैदा हुआ तो किसी में आक्रोश। क्रांतिकारियों की एक नई नस्ल पैदा हुई जिन्होंने जवानी देखने से पहले ही खुद को देश के नाम कर दिया। ये सब विचार मुझे अभी बीते गणेशोत्सव को देख कर पुन: स्मरण हुए। गणेशोत्सव प्रारंभ में कोई ब्रह्म भक्ति का प्रतीक नहीं था, गणेशोत्सव प्रतीक था क्रांति का, नए विचारों का, अनेक विचारधाराएं जो पूरे विश्व में थीं उनको साझा करने का। गणेशोत्सव 1893 में लोकमान्�� तिलक जी द्वारा बंबई में आयोजित एक प्रतीक था लोगों को एक दूसरे से जोड़ने का। तिलक जी के अथक प्रयासों के कारण उनके विचार सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं रहे परंतु विदेश में अनेकों क्रांतिकारियों ने उनसे सीख ली और क्रांति को नया मोड़ दिया। हम जानते हैं कोई भी विचारधारा बिना संस्था, बिना समुदाय के आगे नहीं बढ़ सकती। यही कारण था की भारत के सभी बुद्धिजीवी क्रांतिकारियों ने संस्थाएं स्थापित की। संस्थाओं का मूल उद्देश्य प्रगति और स्वतंत्रता था, आज के दौर में हम नई संस्थाओं को स्थापित करते हैं, उनका हिस्सा होते हैं, परंतु हमारे उद्देश्य हमारे पुरखों से भिन्न हैं। हम चाहते हैं की हम अधिक से अधिक लाभ ले सकें, हम अधिक से अधिक माया जोड़ सकें, यश पा सकें। ऐसा नहीं है की हमारे देश को, हमारे विचारों को क्रांति की आवश्यकता नहीं है। मेरा मानना है कि आज के ही दौर में हमें क्रांति की सबसे अधिक आवश्यकता है। हमारे ऊपर बाहरी ताकतों का, बाहरी विचारों का इतना प्रभाव है कि हम कहने सोचने को तो स्वतंत्र हैं परंतु ये स्वतंत्रता हमारी नहीं है। दोफ़तोस्की ने कहा था “कैदी को भागने से रोकने का सबसे अच्छा तरीका यह सुनिश्चित करना है कि उसे कभी पता ना चले कि वह काराग्रह में है।” यह पढ़ने के बाद हम में से कुछ लोग सोचेंगे की हम तो अपनी संस्कृति अपने ज्ञान से जुड़े हैं, उनके लिए सवाल। आपकी मादरी ज़बान क्या है? और आपने अपनी मादरी ज़बान में आखिरी बार, कोई लेख, साहित्य कब पढ़ा था? जो हम आज कर रहे हैं जो हम आज सोच रहे हैं, उस सब का हमारी मादरी ज़बान में प्रलेखन हम क्यूँ नहीं कर रहे। क्या अपनी जड़ों से जुड़ा रहना इतना कठिन है या हम इसे दिन-प्रतिदिन कठिन बना रहे हैं। लोकभाषाएं, लोकगीत, लोकभाषा के नाटक आज हमारे ज्ञानकोष से विलुप्त हो गए हैं। इसका क्या कारण है? बाहरी विचारों को पढ़ना, बाहरी भाषाओं को महत्त्व देना विश्व को समझने के लिए आवश्यक है, परंतु इसका सीधा प्रभाव हमारी निजता पर पड़ रहा है। यदि हमारी ही तरह एक प्रांत के, एक देश के लोग अपनी भाषा को पिछड़ी नजर से देखते और उससे नाता रखने में संकोच करते तो सैकड़ों रामायण नहीं लिखीं जाती।

ऐसे ही हम यदि प्रगति के पथ पर अग्रसर रहे तो वो दिन दूर नहीं जब हमें अपनी कथाएं, कहानियाँ बदलनी पड़ेंगी। हमने अकबर बीरबल की कहानियाँ तो सुनीं होंगी, उनमें एक बहुप्रचलित कथा है जिसमे एक पथिक अकबर के दरबार में आता है और अकबर को उसकी मातृभाषा का पता लगाने की चुनौती देता है। आगे जो होता है वो हम सब जानते हैं। इस कहानी को आज स्मरण करवाने का उद्देश्य ये है कि, हम समझें की हम अपनी ही संस्कृति से इतने अलग हो गए हैं कि आज यदि हम किसी कारण अचानक चौंक जाएं तो हम अपनी पहली बात अपनी मादरी ज़बान में ना कह कर, अंग्रेजी का सहारा लेते हैं। क्या यह विषय या समस्या गंभीर नहीं है?

जैसे किसी भी क्रांति को जन्म देने के लिए या किसी क्रांति को जीवित रखने के लिए, प्रतीकों की स्थापना करना आवश्यक है, उसी तरह क्यों ना हम प्रण लें कि हम अपनी ज़बान को जानने का प्रयास करेंगे और अपने सूक्ष्म से सूक्ष्म प्रयास से उसे जीवित रखेंगे। आप पाठकों में बहुतेरे लोगों को संशय होगा की आपकी मादरी ज़बान क्या है? या आप उससे बहुत समय से जुड़े नहीं हुए, आप प्रयास करें और जानें कि आप जिस संस्कृति के वारिस हैं वो कितनी विस्तृत है। हम यदि इस उद्देश्य के साथ प्रयास करें तो हम संभवतः जान जाएंगे की हम एक दूसरे से कैसे जुड़े हैं, कैसे हमारे जीवन में जो सब है वो हमारी इसी संस्कृति और माँ की देन है, ना की आक्रान्ताओं के साथ लाई गई भाषाओं की।

इंक़लाब ज़िन्दाबाद

क्रांति अमर रहे!