#14

क्या पढ़ें

उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती, उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।

यौवन··हिन्दी

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यह बड़ा कठिन प्रश्न है। सभी देशों में इस पर विचार किया जा रहा है- और बहुत दिनों से। फ़्रेडरिक हैरिसन ने 1879 ईस्वी में कुछ निबंध ‘चॉइस ऑफ बुक्स’ के नाम से लिखे भी थे। ये पढ़ने योग्य हैं। परंतु यह समस्या अभी तक हल नहीं हुई है कि क्या पढ़ना चाहिए। इस उलझन का सुलझना सहज नहीं है। समय कम, पुस्तकें ज़्यादा। समय बीतता जाता है, पुस्तकें बढ़ती जाती हैं, और ‘अंतिम प्रस्थान’ का समय निकट आ जाता है। पहले पुस्तकें कम थीं और राह की कठिनाइयों के कारण उनकी पहुँच एक स्थान से दूसरे स्थान तब सहज में नहीं होती थी। तब लोग एक शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता होते थे। तब विद्या का स्थान मस्तिष्क का और अब पुस्तक का है। जब तक सामने खुली रही तब तक तो विद्वान, उसके बाद सफाचट मैदान। आजकल पुस्तकें समय काटने के लिए या नींद बुलाने के लिए पढ़ी जाती हैं। इसका पहल यह होता है की मक्षतिष्क आलसी हो जाता है और परिश्रम से उसे रुचि नहीं रह जाती है। किसी के भावों और विचारों को समझने के लिए उद्योग करना पड़ेगा, अपने को वैसा ही बनाना पड़ेगा।

एक विद्वान का कथन है कि यह जानने के लिए कि हमें क्या पढ़ना चाहिए, यह जानना आवश्यक है कि क्या नहीं पढ़ना चाहिए। संसार के सभी साहित्यों में हमारे साहित्य का स्थान सब से ऊंचा है। इसमे सभी कुछ है – भाषा, माशूरता, भावों की गंभीरता और विचारों की सूक्ष्मता है। इसमें जो कुछ भी है वो और कहीं भी शायद हो, पर खेद है कि हमारा ध्यान उधर नहीं है। सुखसागर जैसी पुस्तकें कीड़ों का भोजनालय बनी हुई हैं और हम उन पुस्तकों पर मुग्ध हैं जो कविता से कोसों दूर हैं। शृंगार की ही कविता को लीजिए, इसमे भी बड़े बड़े आचार्य हो गए हैं। सभ्यता का साथ न छोड़कर जो कुछ कहा जा सकता था, सब कुछ कहा जा चुका है। देश और स्तिथि का प्रभाव कविता पर हमेशा पड़ता है। किसी कविता में आनंद तब ही आएगा जब समय प्रतिकूल न हो। समयानुकूल निरस को सारस बना देती है।

जैसे भला कौन रणक्षेत्र में भूषण की कविता को छोड़ कर यह पढ़ेगा कि ‘सुकुमारता मंजु मनोहरता मुख चारुता चारु चुई सी परै।‘ पद बड़े मरके का है, इसमें संदेह नहीं, पर समाए की प्रतिकूलता इसके भाव को भंग कर देगी। समयानुकूलता विद्वत्ता की पहली पहचान है। शृंगार कविता का केवल उद्देश्य- मनोरंजन करना है, और मनोरंजन तबही हो सकता है जब चिंता रहित जीवन हो। अब जब खाने के लिए रूख सूखा भी नहीं मिलता, आबरू बचाने के लिए कपड़े नहीं मिलते और यह खयाल कांटे की तरह दिल में चुभ रहा है की आँखों के बंद होते ही क्या खाएंगे और पैसे कहाँ से आएंगे तब पुराने नायिका-भेद का पाठ शांति नहीं देगा। जब भूख से आँखें खुलनी कठिन हैं, शीट से घुटने ठुड्डी से चिपक जाते हैं, तब क्या ‘उर्वशी, मधुबाला’ पढ़ना काम आएगा? बेसमय की बात नहीं फबती है। एक ही स्वर अलापते रहने से या एक ही विषय पर कविता करते रहने से भाषा की सजीवता जाती रहती है। एक विदेशी लेखक ने लिखा है कि सुना हुआ संगीत मधुर और बेसुना हुआ अत्यंत मधुर होता है। किसी बात को बार बार दोहराने से उसकी सरसता जाती रहती है। हमारी प्राचीन कविता में नए भावों को बड़ी कमी है। हमने अभी अपना पुराना रास्ता नहीं छोड़ा है। अब भी हमारा वही रंग है जो शताब्दियों पहले था। स्वास्थ्य के लिए जैसे यदा-कदा भोजन में परिवर्तन की आवश्यकता होती है, वही हाल साहित्य का भी है। अरुचि से बचने का केवल यही उपाय है। कवि अपने देश की सुरुचि का निरीक्षक और सुरक्षक है। वह जानता है कि देश की स्तिथि क्या है। वह यह भी जानता है कि देश में किन भावों की कमी है और उनकी पूर्ति कैसे की जा सकती है, चाहे उसकी कोई सुने या ना सुने। सच तो यह है कि जिसकी कविता में केवल शब्दाडंबर नही है, भाषा में सरलता है, भावों में गंभीरता है, विचारों में उच्चता है, शब्दों में मधुरता है, स्वाभाविकता है, समयानुकूलता है उसे कौन नहीं सुनेगा? बड़े आदमी मर कर जीते हैं तब उनकी सुनी जाती है। क्या महर्षि वाल्मीकि की कविता का उनके जीवन में यही आदर था जो आज है? ख्याति मृत्यु के बाद प्राप्त होती है। बड़े आदमियों के विचारों से संसार सदैव प्रतिध्वनित हुआ करता है। एक कवि कहता है-

"विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सुमृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिये,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।"

आजकल ऐसी ही कविता की आवश्यकता है। आजकल इसी के दिन हैं। ऐसे ही आदेशों और उपदेशों से भारत का उद्धार होगा। और कवि को अमरत्व प्राप्त होगा।

बेकन ने कहा है- ‘कुछ पुस्तकें केवल स्वाद लेने के लिए, कुछ निगल जाने के लिए और कुछ पचाने के लिए होती हैं।‘ स्वर्गीय पंडित विष्णु नारायण दर के निज पुस्तकालय में बहुत कम पुस्तकें थीं और जो थीं उन्हे पण्डितजी ने इतनी दफ़े पढ़ था कि वे उनका अंग बन गईं थीं। गूढ भावों और विचारों के समझने में वे महान परिश्रम करते थे। यही हाँ डाक्टर रासबिहारी घोष का भी था। वे कहा करते थे कि वास्तव में पढ़नेवाली पुस्तक को पचास दफ़े से कम पढ़ना उसकी अवज्ञा करना है। सत्य है, जिस पुस्तक के सिद्धनी समझने में मक्षतिष्क को परिश्रम न करना पड़े तो वह उस कागज़ के दाम की महंगी है जिस पर वह छपी है।

न जाने क्यों हम मूल ग्रंथ को पढ़ने से हिचकते हैं- चाहे उसकी प्रशांश में या नींद में एक बड़े पुस्तकालय की सब पुस्तकें पढ़ना पड़े। और उसका परिणाम यह होता है कि किसी बड़ी पुस्तक पर हमारी कोई राय नहीं होती है। हम वही गाते घूमते हैं जो औरों ने कहा है।

यह हम जानते हैं कि  गोस्वामी तुलसीदास-कृत रामायण के लिए देशी एर विदेशी विद्वानों की क्या राय है, पर यह नहीं जानते की अपनी स्वयं क्या राय है। कारण? कारण यह की इसे कभी हमने पढ़ा  ही नहीं।

यदि यह कहा जाए जैसा प्राय: लोग विचार कर के कहते हैं तो क्या नाटक, क्या उपन्यास या गद्य पढ़ें याहेन। मेरा नम्र निवेदन यह है कि अवश्य पढे जाएँ। ये साहित्य के मुख्य अंग हैं। इन्हीं में भाषा की सजीवता का पता चलता है।

पुस्तक का वही स्थान है जो मित्र का है। जैसे चरित्र-हीन मित्र दुख�� होते हैं वही हाल चरित्र-हीन पुस्तक का है। इसी कारण यह कहा गया है कि इन दोनों के चुनाव में बड़ी सावधानी से काम लेना चाहिए।

यह विषय गहन है और कठिन है, और अब कुछ पुराना भी होता आया है। साहित्य प्रेमियों और सुयोग लेखकों को चाहिए कि वे लोगों के पथ प्रदर्शक बनें।