#13

महाभारत और महाप्राण

ब्राह्मणोस्य मुखमासीत बाहू राजन्यः कृतः | उरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शुद्रो अजायत॥

यौवन··हिन्दी

image Bal Ganesh writing Mahabharat साहित्य और वेदों का अध्ययन करने के बाद बहुत से विचार, रीतियाँ और कहानियाँ मुझ पर खुलीं। मेरा मानना है की कभी ना कभी वो कहानियाँ हम तक पहुंचनी जरूरी होती हैं, भले वो किसी से सुनी हुई हो, किसी को कही हुई हो। उन कहानियों का अस्तित्व, उनकी अहमियत इस बात से तय नही होती की ये किस्से कहानियाँ कितनी विख्यात है, परंतु इस बात से होती है की उनका सार, सत्य और काम क्या है। ऐसी ही एक कहानी मुझे याद आई भगवान गणेश की, भगवान के जन्म की कथा तो अक्सर हमने सुनी और देखी होगी। उस कथा का स्मरण करते हुए आज एक और किस्सा सुनाता हूँ।

जैसे हम कभी शाम को अपने मित्रों, सहचरों के साथ बैठ जाते हैं, वैसे ही प्रभु भी अपने साथियों के साथ समय व्यतीत करते थे, त्रिपुरारी के पुत्र होने के नाते उन्हे इतनी सहूलत मिलना कोई विचित्र बात नहीं है। हम में और उनमे अंतर इतना है की वे स्वयं माहाज्ञानी होने के साथ-साथ महाज्ञानियों का संग करते थे। तो एक शाम एक पर्वत पर बैठे व्यास जी गणेश जी मिलने गए, पुराण बताते हैं की दोनों महाज्ञानियों ने जिन सूत्रों पर बातें की, जिन विषयों का चयन कर उनके बारे में संभाषण हुआ, वही सब ब्रह्मा जी ने सुना और उनके आदेश अनुसार व्यास जी ने वेदों की रचना की। हम सभी को ज्ञात है कि प्रथम वेद ऋग्वेद हुआ, ऋग्वेद के १० वे मण्डल में, पुरुष सूक्त में भगवान ने पुरुष की उत्पत्ति का वर्णन किया है।

ब्राह्मणोस्य मुखमासीत बाहू राजन्यः कृतः |
उरू तदस्य यद्वैश्य: पद्भ्यां शुद्रो अजायत॥

गणेश जी यह सब साक्षी हो कर देख रहे थे, ब्रह्मा जी के आदेश से कार्य पूर्ण हो जाने के बाद उन्होंने व्यास जी से अपने भाव प्रकट किए। पुराण बताते हैं कि इसी बात को ले कर व्यास जी और गणेश जी की बहस हो गई थी। व्यास जी को अपने ज्ञान पर अभिमान था, इसी अभिमान के कारण उन्होंने गणेश जी को एक चुनौती दे दी, गणेश जी ने स्वीकृति देते हुए नियम सामने रखे। चुनौती के नियम हुए, जब तक व्यास जी कथा कहते जाएंगे, तब तक गणेश जी लिखते जाएंगे, यदि व्यास जी किसी कारणवश कथा कहना बंद कर देंगे, उसी क्षण गणेश जी लिखने पर विराम लगा देंगे और विजयी हो जाएंगे, परंतु यही किसी कारणवश गणेश जी लेखन पर विराम लगा देंगे तो व्यास जी विजयी होंगे।

ये नियम निर्धारित हए और महर्षि नारद जैसे ज्ञाता इस चुनौती के संचालक हुए। प्रकार महाभारत की कथा आरंभ हुई। व्यास जी ने कहना शुरू किया और गणेश जी लिखते गए, यही सिलसिला कई दिनों तक चला, इस महाकाव्य को सुनने और इस चुनौती को सारे जगत ने देखा। कभी व्यास जी गति बढ़ जाती तो कभी गणेश जी की गति में कुछ परिवर्तन दिखाई देता, परंतु दोनों ही अपने लक्ष्य को लिए अडिग थे। इसी दौरान एक दिन ऐसा आया जब व्यास जी की गति अति तीव्र होने के कारण, गणेश जी से कलम खंडित हो गई। यह देख कर मानो सारा संसार रुक गया हो, व्यास जी मन ही मन पुलकित हुए, परंतु अगले ही क्षण गणेश जी ने वज्र समान अपना दंत तोड़ दिया और लिखते रहे। यह देख कर विस्मय के कारण व्यास जी की गति धीमी हो गई। महाभारत महाकाव्य की रचना कई वर्षों तक चली, इस चुनौती का अंत कथा के अंत के साथ हुआ, व्यास जी ने अंत में पांडवों को स्वर्गवास दे दिया और भुवन को शांति का आशीर्वाद दिया। व्यास जी ने गणेश जी को नमन कर अपनी पराजय स्वीकार की और महाभारत महाकाव्य को जगत को सौंप दिया। इस चुनौती के दौरान एक ही मुद्रा में बैठे रहने के कारण, गणेश जी की देह अकड़ गई थी, उनकी देह को पुनः जागृत करने के लिए उन्हे जल में ले जाया गया। गणेश जी को जल स्पर्श होते ही वे जल में प्रवाहित हो गए और अपना वही रूप ले लिया जिस से उनका जन्म हुआ था। ये दृश्य त्रिभुवन ने देखा, देवताओं ने अपना आशीष दिया और कथा आगे बढ़ी।

हमारे हृदय में गणेश जी कभी बड़े क्यूँ नहीं हुए? हमारे हृदय में गणेश जी के बाल रूप के अलावा कोई और चित्र है ही नहीं। हनुमान जी का बाल रूप हमें स्मरण है और उनकी लीलाएं याद हैं, हमे ये भी ज्ञान है की प्रभु चिरंजीवी हैं। परंतु गणेश जी को हम भक्त प्रेम से बस बाल रूप में ही देख पाते हैं।

इस बार के लेख में आपको समर्पित है बस ये कथा, कविता से भेंट अगले लेख में।

बहुत आशीष,

यौवन