उर्वशी
अंतिम बार प्रेयसी देख तुम्हे बढ़ इंद्र सिंघासन ले लूं मैं
Urvashi and King Pururavas - Raja Ravi Varma```
उर्वशी
भोर विनम्र सरल सी थी चकोर सवेरा लाया था कितना सुन्दर जीवन है तुमसे मैं बतलाया था
चेहरे पर मुस्कान सँवारे आँखें थीं नभ के और पार इच्छाओं के कुछ अंश खुले कैसा होगा अम्बर अपार
कुछ समय धरा पर रह कर तुम क्या त्याग चुकी थीं स्वर्ग राग प्रेम तुम्हारी छवि में दिखता हास्य में देवों का वीराग
दुर्गम दृश्य हुआ कैसा होगा जिस क्षण स्वर्ग स्वर्ग से अलग हुआ प्रेम,जीवन नश्वर के नाम किया और फूल लता से अलग हुआ
जिस हठ से मैं तुम एक हुए उस हठ का ज्ञान नहीं था इतना रौद्र मिलेगा रस में तिल भर भी भान नहीं था
प्रेम नया था मेरी खातिर ना तुम जानी पहचानी थीं देव धरा भूमि की भी मर्यादाएं तुम्हे सीखनी थीं
मैं स्वप्नलोक में खोया था जब काल तुम्हे हरने आया संग भाग्य मेरा भी सोया था रण रंग नहीं भरने पाया
हाय,
खो कर तुम को मैं भी यूँ बालक सा बिलखाता हूँ हो स्वर्ग धरा सा वंचित बिखरे सुदृढ़ संकल्प सुनाता हूँ
मेरी स्मृति तुम बानी रहो नहीं देव तुम्हे रख पाएंगे मुझ नीच मनुष के मर्दन से मृत्यु सिंघासन पाएंगे
अजर साहस और चिंतन कर हृदय यातना झेलूं मैं अंतिम बार प्रेयसी देख तुम्हे बढ़ इंद्र सिंघासन ले लूं मैं
- यौवन