कविता का कर्म
महाकवि दिनकर की ‘अर्धनारीश्वर’ पढ़ने के दौरान ये प्रश्न आया की ‘कविता का कर्म क्या है?’ इस प्रश्न को साहित्य और दर्शन के माध्यम से देखने पर एक कविता हुई। ये कविता प्रियतम को समर्पित।

महाकवि दिनकर की ‘अर्धनारीश्वर’ पढ़ने के दौरान ये प्रश्न आया की ‘कविता का कर्म क्या है?’ इस प्रश्न को साहित्य और दर्शन के माध्यम से देखने पर एक कविता हुई।
ये कविता प्रियतम को समर्पित।
सुनो सुधाकर! ज्ञान मूल तुम जब तक दिनकर आता है रजनी के इस शांत पहर में बस प्रियतम तक मन जाता है इसी पहर में कविता खुलती खुल जाती दुनिया स्नेहमयी कविता के तुम कर्म को देखो होगा देखो यहीं कहीं प्रारब्ध कर्म के बूते पर हर कविता प्रभु को अर्पण है लिखनेवाले का कर्म है कविता पाठक को वो दर्पण है प्रभु को दर्पण दिखलाऊं ये चाहत भोलि-भाली है संसार का चिंतन छोड़ के मन की मंशा हुई निराली है कविता का तो धर्म जन्म से ऊपर चलते जाना है कविता नभ पर पर्वत जैसी निर्जर पढ़ने वाला है कालान्तर से कालजयी है कविता की जो एक विधा जिसमे ख्याति ब्रह्मा ने पाई जिसमे दिनकर ने लेख लिखा मूल ज्ञान बस लिखते रहना जो मूल ज्ञान तुमने पाया देख सवेरे रश्मिरथ पर लिए सुधा दिनकर आया
- यौवन